Thursday, August 16, 2018

अटल बिहारी

अब जब अटल जी नही हैं ।तब वह तमाम उम्मीद बेईमानी होगी जो हम एक सभ्य राजनेता से करते हैं ।जिस गरिमा की राजनीति के आख़री पायदान पर हमने अटल जी को देखा था,वह सीढ़ियाँ अब खत्म हो गई ।
जब आप एक लम्बी राजनैतिक पारी खेलते हैं तो सबसे पहले दलगत सीमाएँ टूटती हैं,फिर जातिगत और धार्मिक बन्धन खुल जाते हैं ।यह भी एक परम्परा रही है, जिसे अटल जी ने आख़री तक समेट रखा ।अब यह सीमाओं को तोड़ने वाली खेप खत्म हो गई ।अब कोई चाहे जितनी लम्बी।पारी खेले और चाहे जितने बड़े संवैधानिक पद पर पहुँचे, उसका दिल संकुचित ही रहेगा,वह धर्म और जाति में बंधा बँधुआ गुलाम मात्र है ।अटल बिहारी वाजपेयी की खींची लकीर के सामने उनके पीछे चलने वाले हर नेता बौने ही नज़र आने वाले हैं ।

यह देश अपनी लम्बी समृतियों में उस शोखदिल कवि को अलग जगह देगा ।जो बहुत बार खुद में एक विपक्ष था,जिसके अंदर एक इंसानियत की सत्ता थी ।जो अपने रास्ते खुद बनाता था तो कई बार पुराने बने हुए रास्तों से लौट आता था ।रथ यात्रा के नायक को अपने पीछे चलाने की सलाहियत और देश के आमजन के दिलों में पहुँचने का हुनर बहुतों के लिए शोध और सीखने का विषय है ।
मैं आज जब बन्द आँख किये हुए अटल जी को देखता हूँ,तो सोचता हूँ की आखिर हमारे लोकतन्त्र की खूबियों को क्यों न सराहें,क्यों न संविधान बनाने वाले और देश को बुनने वालों की तारीफ़ करें जिनकी बदौलत अटल जी जैसी शख्सियत बिलकुल सही पद तक पहुँची ।
मैं नेहरू के बारे में सोचता हूँ की यह कैसी शख्सियत थी जिसका अपने दल पर तो प्रभाव पड़ा ही विपक्ष पर भी अपनी छाप डाल गए ।उनकी छाँव से गुज़रा विपक्ष का यह सूरमा अपने ही दल में सबसे अलग और विशिष्ट था ।वह कौन सी वजह थीं जिन्होंने अटल जी को उनकी ही पँक्ति के सभी नेताओं से अलग सभी के दिलों का टुकड़ा बना दिया था ।

अटल बिहारी वाजपेयी का न रहना उस बदनसीब घर के जैसा है, जिसके वारामदे से बड़े बुज़ुर्ग का साया हट गया हो ।दरवाज़े पर जिनके रहने से घर ,घर लगता,रौनक थी,जिनके न होने से दर ओ दीवार तो रहेंगे,लोग भी रहेंगे बस घर का मज़ा चला गया ।हम सब दिल को बहलाने के लिए कहेंगे की हमने अटल जी को देखा था,सुना था,मिले भी थे ।हम भी कभी राजनीति में निकले तो कहेंगे की हम अटल जी की उन अलहदा गलियों से होकर गुज़रे हैं जो नेहरू तक जाती थीं ।देश को,देश के हर इंसान को,देश की परम्पराओं को,देश के संविधान को,देश के लोकतन्त्र को बेइंतेहा बेलौस चाहने वाले उसके पुत्र अटल जी आज महान देश की गोद में वापिस सो गए।तमाम सुनहरी जलती बुझती यादों के साथ नमन

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