धर्म जब पहले पहले आते हैं, तब समन्दर होते हैं ।विशाल हृदय के समन्दर हर एक को अपने में समा लेने का हुनर रखते हैं ।
फिर धीरे धीरे यह समन्दर बहकर नदियों में बदल जाते हैं ।उसके बाद यह तालाब में बदलते हैं ।फिर यह नालियों में बदल जाते हैं और एक वक़्त के बाद यह नालियों में सड़ते हुए कीचड़ में बदलकर अपने अंदर की बदबू से हर एक को नाक पर रुमाल रखने को मजबूर कर देते हैं ।
यह भी है की नालियाँ सदैव अपने समुद्र रूप का बखान करती हुई बदबू छोड़ती रहती हैं । वह बोलते हैं की प्राचीनकाल से ही हमारा हृदय विशाल और सहिष्णु रहा है, यह ज़रा कुछ लोगों के चक्कर में हम ख़ून चख भर लेते हैं, वरना हम तो सदैव शाँति प्रिय ही रहें हैं । और यह कहते हुए हर धर्म के लोग खुद के नाली रूप पर चादर ढककर समन्दर होने का झाँसा पाते या देते रहते हैं
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