Monday, September 23, 2019

मसरूर जहाँ

एक दिन हम भी चुपके से चले जाएँगे, कोई आहट नही होगी । कौन पूछता है,परसों रात हमारे बीच से एक ऐसी शख्सियत गुज़र गई,जिसके गुज़रने से एक कुछ वक्त नही फिसला बल्कि पूरी एक सदी ही फिसल गई ।

परसों शाम उर्दू अदब में इतनी बड़ी जगह खाली हुई, जिसकी भरपाई हो ही नही सकती । ताज्जुब तो यह है लखनऊ में डूबे उर्दू के इस सूरज से कहीं भी मायूसी का अंधेरा नही छाया,क्योंकि बदनसीबी से बहुत लोग उनको जान ही नही पाए ।

जब लोग एक दो नावेल लिखकर इतराते नही फिरते तब 65 नावेल और 500 के ऊपर शार्ट स्टोरी लिखकर यह शख्सियत दुनिया ए फ़ानी से कूच कर गई। अभी तो लखनऊ ने उनकी शार्ट स्टोरी का कलेक्शन "ख्वाब दर ख्वाब सफ़र",सन 2016 में देखा था,किसे पता था यह आख़री है । हम जैसे तो किस्मत वाली यह आख़री पीढ़ी थे,जिन्होंने उनके साय में ज़िन्दगी की शुरआत की थी । दुनियाभर में बहुतों ने इनपर पीएचडी की,यही नही जावीद खोलोव,
तजाकिस्तान यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने भी इनपर ही पीएचडी की थी । आपको हैरत होगी कि अदब की यह शख्सियत जिसपर लोग पीएचडी कर रहे थे,वह खुद हाईस्कूल के आगे का मुँह नही देख सकी थीं । घर आंगन के तमाम फ़र्ज़ों में उन्होंने साहित्य की जड़ मे खूब खाद पानी डाला ।

लखनऊ के पास फतेहपुर में पैदा हुई और लखनऊ में ही शुरुआती तालीम हासिल करने वाली शख्सियत लखनऊ में तालकटोरा के कब्रिस्तान में सो रहीं। कल ही सुपर्द ए ख़ाक किया गया,कल लखनऊ बारिश से सराबोर था,उर्दू अदब के डूब चुके इस सितारे को बादल गरज गरज कर सलामी दे रहे थे । जब शहर नही रोया,तो बादलों ने सारी ज़मीन ही नम करदी । उनके वालिद नसीर हुसैन "ख्याल" भी आला दर्जे के शायर थे। उनकी परवरिश ने ही अपनी बच्ची में वह बीज बोए जो अदब का भरा पूरा बाग़ हुईं ।

उनकी पहली नावेल रूमा 1965 में पब्लिश हुई । भारत पाकिस्तान और कनाडा में बराबर से उनकी कहानियाँ छपती रहीं हैं । दुनिया के हर कोने में जहाँ उर्दू पहुँची वहाँ लखनऊ के आंगन की ज़ीनत वह मशहूर कलम "मसरूर जहाँ" भी पहुँची । लोगों ने उनकी कलम को पलकों पर बैठाया ।

किताबों की एक लंबी फेहरिस्त और ज़िन्दगी के हर तजुर्बा को हमारे लिए छोड़कर मसरूर जहाँ साहिबा सुक़ून की तरफ लौट गईं । उनका जाना और जाने पर यूँ बिखरी खामोशी ने हमे उलझन में तो डाला,मगर जल्द ही हमने भी मान लिया,जो बाज़ार से दूर है, उसके जाने पर बाज़ारवादियों पर फ़र्क़ नही पड़ता । मसरूर आपा,हाँ आपा क्योंकि वह किसी की आंटी थी तो किसी की आपा, किसी के दादी, तो किसी की नानी,वह इन्ही रिश्तों के बीच चोटी की राइटर थीं । मसरूर आपा के बारे में मुझे सबसे पहले मेरे नाना ने बताया,नानी अम्मी तो आख़री तक उन्हें पढ़ती ही थीं । इसलिए,वह घर की कलम रहीं । उनका न होना अफ़सोसनाक तो है मगर वह अपनी ज़िन्दगी से बहुत ज़्यादा काम कर गई । आज नही तो कल उनको ढूंढा जाएगा,जब उनकी कलम तो मिलेगी मगर वह नही,कभी नही ...

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