11 सितम्बर 1906 का दिन था । जोहान्सबर्ग के इम्पीरियल थियेटर में करीब 3000 लोगों की भीड़ थी । यह सभा गाँधी जी ने बुलाई थी । 22 अगस्त 1906 के "ट्रांसवाल गवर्नमेंट गजट" में एक अध्यादेश का मसविदा छपा ,जो विधानसभा में पेश किया जाने वाला था । गाँधी जी ने सोचा यदि यह स्वीकृत हो गया तो दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों का सर्वनाश हो जाएगा । इस प्रस्तावित अध्यादेश के अनुसार सभी भारतीय पुरुष,महिलाओं और आठ साल से ऊपर के बच्चों के लिए ज़रूरी था कि वह अधिकारियों के रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करवाएँ ,उंगलियों के निशान दें,एक प्रमाणपत्र प्राप्त करें,जिसे हमेशा अपने साथ रखें ।
सभापति द्वारा करवाई शुरू किए जाने से पहले ही थियेटर का आर्केस्ट्रा, बालकनी और गैलरी खचाखच भर गए थे । चार भाषाओं में क्रोध भरे भाषणों ने भड़क उठने वाले श्रोताओं को आवेग के ऊंचे दर्जे तक थर्रा दिया था । तब सेठ हाजी जी ने गाँधी जी द्वारा तैयार किया प्रस्ताव पढ़ा,जिसमें मांग की गई थी रजिस्टर में नाम दर्ज करवाने वाले कानून की अवज्ञा की जाए ।
इसके बाद गाँधी जी बोले । पहले तो उन्होंने लोगों को चेतावनी दी, फिर उन्हें उत्तेजित करने का प्रयत्न किया । उन्होंने कहा," सरकार ने भलमनसाहत की सारी बुद्धि को तिलांजलि दे दी है ।...लेकिन मैं हिम्मत और निश्चय के साथ घोषित करता हूँ कि जबतक अपनी प्रतिज्ञा पर सच्चाई के साथ डटे रहने वाले मुट्ठीभर लोग भी रहेंगे ,तबतक संघर्ष का एक ही अंत हो सकता है-वह है विजय"
यह क्यों लिखा आज,क्योंकि जो गाँधी को मानते हैं, वह ही गाँधी को नही मानते हैं । देश मे कश्मीर और असम की एनआरसी काफी है समझने के लिए की जो गाँधी के होने का दावा करते हैं, वह भी उनसे बहुत दूर है । गाँधी उन कानूनों को नही मानते,जिनसे ज़िन्दगी क़ैदख़ाने की जैसी हो जाए । भारत से कोसों दूर दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की आज़ादी का संघर्ष निडर होकर किया था । ऊपर लिखी इम्पीरियल थियेटर की घटना के बाद गाँधी जेल गए,एक नही तीन बार,यंत्रणाएँ सही मगर घुटने नही टेके,न इसमे डरे की दक्षिण अफ्रीका में सरकार क्या सोचती हैं, बहुसंख्यक क्या सोचते हैं, अल्पसंख्यक क्या करते हैं । सच के साथ निडरता से खड़े हुए ।
सही बात तो यह है जैसे अफ्रीका में एक सभा के दौरान बहुत बड़ा लोहे का कड़ाहा आग पर रखा गया,उसमे तेल खौलाया गया और उसी तेल में हज़ारों लोगों ने अपने रजिस्ट्रेशन के प्रमाणपत्र डालकर भस्म कर दिए और जेल का रास्ता चुना । वैसे ही भारत में एक यज्ञ कुंड बनाया जाए और एनआरसी को उसमें डालकर भस्म किया जाए,यह करने पर जेल जाना पड़े,तो सहर्ष जेल जाया जाए, क्योंकि नफरत फैलाने और लोगों को आपस मे बाँटने वाली ताकतों के खिलाफ जेल जाना देशद्रोह नही बल्कि देशप्रेम है । जो देश से प्रेम करेगा,वह बाँटने वाली हर ताक़त के विरुद्ध ही होगा ।
जिन्हें एनआरसी और कश्मीर में सिर्फ मुसलमान नज़र आ रहें,वह अक़्ल के अंधे लोग हैं । इन दोनों जगह मानवता फसी हुई है । एक बार कल्पना करिएगा की अगर गलती से ही सही आपके घर के पांच लोगों में एक का नाम एनआरसी में ना आए, तो सोचिए क्या बीतेगा आपपर,यह होगा,ज़रूर होगा,क्योंकि इस काम को अंजाम देने वाले वही हैं, जो वोटरलिस्ट बनाते हैं, राशनकार्ड बनाते हैं, जनगणना करते हैं, आप सब जानते हैं, इनमे कितनी गलतियाँ होती हैं । एनआरसी में तो एक गलती नागरिकता ही गवा बैठेगी ।
मैं चाहता हूँ कि जो भी कानून मानवता के विरुद्ध हो,जिससे आज़ादी घटे,जो हमारे संविधान के दिये अधिकारों का अतिक्रमण करे, उस कानून को दक्षिण अफ्रीका के उसी कड़ाहे में तलकर भस्म करके,घर की जगह जेल चुनो । महात्मा गाँधी ने हमे स्वतंत्र, नैतिक,मानवीय,सच्चा इंसान बनने का हर रास्ता दिखाया है, उसपर चलकर,कष्ट सहकर, उसे नष्ट करके दिखाया है । गाँधी के मानने वालों, हम उनसे नही कह रहे,जो गांधी को वाट्सएप यूनिवर्सिटी के प्रोपेगण्डा से जाने हैं, हम उनसे ही कह रहें, जो गांधी के संघर्ष को जानते और मानते हैं, वह अब चुप मत रहें । जेल की सलाखें इतनी सख्त नही हैं, जितनी धर्म छोड़कर अधर्म में लिपटी सुंदर दीवारों में कैद सच्चे हिंदुस्तानी की आत्मा का चुप रहना । विरोध करें उससे पहले की फिर गुलाम बना दिये जाएँ....
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