कश्मीर का नाम मत लो वरना बहुसंख्यक खफ़ा हो जाएँगे । यह मत कहो,वह मत कहो नही तो बहुसंख्यक नाराज़ हो जाएँगे । बहुत साल पहले यही होता था कि तीन तलाक़ पर मत बोलो वरना अल्पसंख्यक नाराज़ हो जाएँगे । इसपर मत उस पर मत बोलो वरना अल्पसंख्यक नाराज़ हो जाएँगे । असल मे मसला यह है कि पहले भी और अब भी इंसानों को संख्याओं के झुंड समझकर सिर्फ अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक में बॉलीबॉल खेला जा रहा है ।
जब जिसके सर पर सत्ता का हाथ हुआ,वह बौराया बौराया फिरता है, मगर इनको हासिल कुछ भी नही होता । कुछ वक्त के बाद रोएँगे की हमारे बौराने से भी हमारे बच्चों को क्या मिला,भला पागलपन से भी कुछ हासिल हुआ है, सिवाए ईंटे पत्थर फेंकने के ।
हम आजतक यह क्यों नही कर पाए कि सच बात करें । पता नही क्यों सच अपने धर्म के लेंस से देखने की आदत है । अरे छोटी सी चीजें हैं, जो गलत है, वह गलत,इसमे चाहे कोई नाराज़ हो या खुश,हमे क्या ।
यह जो संख्याओं का खेल है, यह जो भीड़ की ताक़त का उत्सव है, इससे कोई तरक्की नही कर सका सिवाए मुट्ठीभर चालाक लोगों के,यह वही लोग हैं जिन्हें पता चल भर जाए कि आप की खाल बाजार में महँगी बिकेगी,एक झटके में खाल उतारने की फिराक में लग जाएँगे, बिना यह सोचे कि आप उनके धर्म या देश या मोहल्ले के हैं ।
नवरात्र चल रहें हैं, इसमें भी अगर सच कहने की सलाहियत नही आई तो बेकार हैं आप । अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक अगर वह सच बोलते हैं, तक़लीफ़ पर खड़े होते हैं,आपस मे एक दूसरे से मोहब्बत करते हैं, एक दूसरे को तरक्की के रास्ते पर ले जाते हैं, इंसान की बराबरी को मानते हैं तब तो वह जन्मभूमि के हितैषी हैं, वरना दुश्मन ही तो हैं ।
इधर गुज़र रहे हर वक़्त को देखिये,खुद को देखिये,यह देखिये की आप सच के साथ थे या झूठ के साथ । आपके साथ ने सच का झंडा ऊंचा किया या झूठ का । आपकी आंखें सच देख सकीं या केवल देख ही सकी जो दिखाया गया । गलत को गलत लगना और कहना नही आया तो बद्तर हैं आप,यहीं से तय होगा कि आप हैं क्या...
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