बिल्कुल ऐसे ही तो माहौल था,दिमाग पर ज़ोर डालें,सब याद आएगा । बस इस माहौल में थोड़ा कुछ और ऐड कर लें,जैसे इंटरनेट बैन था और घरों में कैद लोगों के तमाम रिश्तेदार जेल में थे और इस क़ैद पर लोग उनके समर्थन की जगह उनपर हँस रहे थे । उनको सबक सिखा रहे थे,उनकी रोती हुई आंखों में अवसर तलाश रहे थे,उनकी ज़मीनों पर दांत गड़ाए थे ।
वह कश्मीर था । अभी तीन दिन ही हुए हैं और हम घर मे रुकने में परेशान हैं । वह महीनों घरों में कैद थे । हमारे पास इंटरनेट है, उनके पास नही था । हमारे पास बात करने को फोन हैं, उनके यहाँ यह भी बन्द था । उन्होंने यह सब अकेले झेला, हम तो पूरे संसार के साथ झेल रहें । जो दुख अकेले पड़ता है, वह बहुत दर्द देता है, जो दुख सबके साथ पड़ता है, वह कट जाता है ।
कुछ संवेदनशील लोग उस दर्द को महसूस करके उसवक्त ही बेचैन थे । कुछ को आज समझ आ रहा होगा । अभी तीन दिन हुए हैं, अभी लम्बा झेलना है, ईश्वर हम सबको धैर्य दे ।
दूसरों की स्थिति का मज़ाक मत उड़ाया कीजिये । बहुत लोग चीन पर हँस रहे थे । इटली के मज़ाक उड़ा रहे थे,अब हम सब वहीं खड़े हैं, जहां चीन,इटली,ईरान खड़ा है । हम उनकी बात नही करते जिन्हें नफरत फैलाने के पैसे या मानसिक संतोष मिलता है । हम उनकी बात कर रहें,जिनमे संवेदना हो,जिनके मां बाप ने लोगों की तक़लीफ़ का मज़ाक बनाना बुरा बतलाया हो,हम अच्छी परवरिश के लोगों से कह रहे,लोगों से हमदर्दी रखो,उनसे मोहब्बत रखो ।
सीरिया में समंदर के किनारे मरे बच्चे हों या म्यांमार के भागते रोहिंग्या हों,तालिबानियों,आईसिस के हाथों मारे मासूम हों,अपने यहाँ लिंचिंग और दंगो में मारे गए लोग हों,आतंकवाद में मरने वाले मासूम हों, आदिवासियों के क़त्ल हों या कोई भी ज़ुल्म जो निर्दोष पर किसी ने भी,कभी किया हो,सब सामने घूम रहा है । उस वक़्त की हमारी खामोशी,हमारा मौन समर्थन,हमे आज उस दहलीज़ पर ले आया,जहाँ हम सब बेचारे हैं ।
सब दर्द भूलकर फिर कह रहा हूँ,घर मे रहिए । जब यह महामारी गुज़र जाएगी तब इसके साथ दिलों का और मन का मैल भी धो डालना । कुछ वक्त के लिए ही ज़मीन पर हो,इंसान बनकर रह लो,हैवान बनोगे तो नस्लें झेलेंगी । कितना दर्दनाक है, घरों में कैद रहना,सब कुछ है, बस इंसान को देख पाने,मिल पाने की आज़ादी नही है । इसकी अहमियत को समझो दोस्त,अब से कम से कम बंटना बन्द कर दें,नफरत को भूल जाएँ । ज़ुल्म और जुल्मी से पीछा छुड़ा लें,कम से कम अपने ईश्वर के सामने खड़े होकर सर न झुकाना पड़े की हम ज़ुल्म के पैरोकार थे ।
घर पर रहें । संयम और धैर्य बरतें । कोरोना से निपटने को शासन को सहयोग दें ।
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