राजनीति प्रयोगों का नाम है और इस इंसान ने इतनी कम उम्र में जितने प्रयोग करें हैं, वह बहुत कम लोगों के हिस्से में आया है । आज जब राज्यसभा सीटों में शानदार पॉलिटिकल ट्विस्ट देखने को मिला, तो लगा कि हमारे बीच अभी वह राजनैतिक चेतनाएँ खत्म नही हुई हैं, जिनपर स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स चलते हैं ।
हम अखिलेश यादव की कद्र करते हैं, वजह सिर्फ एक है कि उनको एक साथ अलग अलग देखने की समझ है । उन्हें कोई राजनैतिक उड़ान दिखाकर चरा नही सकता है । वह खुद प्रयोग करने का रिस्क रखते हैं, नतीजे तो अच्छे बुरे आते ही रहते हैं लेकिन यह निडर होकर खुद पर भरोसा करते हैं ।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी के पास इतनी व्यापक समझ वाला नौजवान शीर्ष नेतृत्व नही है । आप मीडिया और आईटी सेल के प्रोपेगेंडा को बाहर रखकर देखेंगे तब समझ पाएँगे इनमे मासूमियत के साथ शानदार समझ है । कब बोलना है, कितना बोलना है, कहाँ बोलना है, क्या बोलना है, इसमें अखिलेश यादव का कोई सानी नही है । यह न उत्तेजित होते हैं और न ही शांत,बीच की एक अपनी लाईन है, उसपर खड़े मिलते हैं ।
कल तक राज्यसभा की सीटों पर एक से एक चाणक्य बने फिर रहे थे,सब एक झटके में हवा हो गए । हम इस कूटनीति के ही तो कायल हैं, राजनीति ऐसे ही होती है ।
मेरा किसी की हार जीत से डेटा प्रभावित नही होता है । मुझे कोई आरोपों लगाकर किसी की समझ के ख़िलाफ़ नही कर सकता है । मैं राजनीति के उन हिस्सों को देखता हूँ,जो छोटे ज़रूर नज़र आते हों मगर आने वाले वक्त में बड़े बनकर उभरते हैं । उत्तर प्रदेश की राजनीति में आप अखिलेश यादव की आंधी देखने को तैयार हो जाएं,यह मेरा अनुभव है क्योंकि उनकी जो फील्डिंग सज रही है, उसका तोड़ विपक्ष में तो किसी दल के पास नही है, सत्तापक्ष ही उसका मुकाबला करेगी ।
अखिलेश यादव के कदम भले अभी असर नही दिखा सके हों,मगर कभी कदम हल्के नही रहे हैं । रणनीति में अभी उनके पसंघे बराबर कोई नही है । मेरे लिए तो सबसे बेहतर चीज़ है कि अखिलेश यादव के संगठन में कोई हल्का युवा भी नही बैठा है, अखिलेश को कोई संघर्ष की तस्वीरों से झांसा नही दे सकता,यह लीडर आँखे पढ़ना जानता है ।
मैं इनकी हर आलोचना सुन सकता हूँ । हर लीडर की आलोचना होना कोई बुरी बात नही है । मगर एक बार बिना लाग लपेट कहना चाहूँगा की देश की राजनीति में उनके इतना समझदार युवा राजनीतिज्ञ नही है, वह राजनेता है । समझ न आए तो गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव से लेकर आजतक राज्यसभा चुनाव को देख लें,बिना तमाशे ढोल के राजनीतिक कदम कैसे उठते हैं, देख लीजिए ।
एक झटके में किसी को खारिज करना बड़ा आसान है मगर उसे समझना बहुत समझदारी का काम है, जो अक्सर हमसे छूट जाता है....
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