Sunday, January 28, 2018

चलो शिकार करते हैं

मनोज और मुनीर बड़े दिनों बाद मिलते हैं।जँगल की ओर जाते हुए तय होता है चलो शिकार करने चला जाए,तफ़रीह आएगी।
मुनीर कहता है यार अब जानवरों के शिकार में मज़ा भी नही आता और रिस्क भी बहुत है, कब इनके चक्कर में बवाल हो जाए।
मनोज कहता है हाँ यार,अब तो मछली का शिकार भी कहाँ रहा,न तालाब हैं और न नदियों में पानी,झीलें तो हमारी मुस्कुराहट सी हों गई,हमेशा के लिए ग़ायब।

फिर दोनों रुकते हैं, सोचते हैं और आँखों में बचपन में वही शिकार वाली चमक दौड़ जाती है।दोनों साथ बोलते हैं-चलो यार इस शिकार में बड़ा मज़ा आएगा,न रिस्क न कोई झँझट, बल्कि और लोग भी बढ़ते जाएँगे,तफ़रीह आएगी,जुलूस निकलेंगे,सब लोग मिलकर शिकार करेंगे,चलो दोस्त हिन्दू और मुसलमान का शिकार किया जाए।
दोनों का शरीर जँगल से शहर की तरफ मुड़ जाता है और आत्मा जँगल की ओर...

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