Wednesday, January 3, 2018

उठो जागो दरवाज़ा खोलो

जब तुम बहस से ही बाहर हो जाओ।जब तुम्हारे वजूद पर होते खौफ़नाक हमले पर कोई कान भी न धरे।जब तुम्हारी भूख,तुम्हारी नौकरी की किसी भी फेहरिस्त में न हों।जब हर एक तुम्हारी बात करने से बचे,की कहीं तुम्हारा ज़िक्र उसे अपने ही घर में बेगाना न बना दे तो सम्भल जाना दोस्त।
सबसे पहले उनसे पीछा छुड़ाना जो तुम्हारे ज़ख्मो पर जमी पपड़ी को नोचकर तुम्हारे दर्द को ज़िंदा रखते हैं।उनसे भी मुँह मोड़ लेना जो तुम्हारे तिरस्कार पर सिर्फ रुदाली बनते हैं।उनसे भी बचकर रहना जो अपनी अथाह दौलत में से कुछ रेजगारियाँ तुम्हारे सामने उछालकर तुम्हारी तरफ नज़र भी नही करते।उन सबो से हटकर जो तुम्हे तुम्हारी शानदार तारीख़ में उलझाकर रखते हैं, उनसे भी गर्दन मोड़ आगे बढ़ना।

अपने लिए भुनभुनाती भीड़ से न कोई आवाज़ चुनना और न कोई लीडर। दिन बदिन टूटते तबक़े को इनकी कोई ज़रूरत नही,यह सफ़ेद हाथी भर हैं।अपने बीच से कोई खिदमतगार चुनना,जो कपड़ों की सिकुड़न में न फंसे,जो हवा से बात करती गाड़ियों में न दौड़े।जो अपनी बातों से तुम्हारी पहले से भरी आँखों में और आँसू न भर दे।इन सबसे बचकर उसके साथ खड़े होना जो तुम्हे भरोसा दे की आने वाला कल तुम्हारा है, बस आज जुट जाओ।आजकी तालीम की तरफ तुम्हारे बच्चों को ले जाए।उनके हाथों में वह किताबें डाल दे जो कल उसके दिमाग को तरो ताज़ा करे।जो तुम्हारे बच्चों के दिलों को बड़ा करदे और उनकी आँखों में ख्वाब बो दे।

यह तो साफ़ दिख रहा ही होगा की तुम्हारे नाम भर लेने से बहुत लोग नज़रे चुराते हैं।वह गलत नही हैं बस अपने आँगन की भीड़ से मजबूर हैं।वह तुम्हारे दुश्मन नही हैं मगर गफ़लत की हालत में उनकी चौखट पर दुश्मन ने डेरा डाल लिया है।किसी से शिकवा मत करना,नाराज़ मत होना,बल्कि इनकी ज़रूरत पर जितनी हो सके मदद करना मगर अपने लिए खुद उठो।अपने रास्ते के दशरथ माँझी खुद बनो।न रो और न रुलाओ।बस जुटकर मेहनत करो।भूखे,प्यासे रहो,जँगल में रहो,घर से दर बदर हो जाओ मगर  पढ़ने का कोई मौका मत छोड़ो।आजकी तालीम से कल के दरवाज़े खोलो।हौंसला दो,अपनों की लाशों के ऊपर किताबें रखकर पढ़ने का हौंसला।

लोग हथियार से तुम्हे मारेंगे मगर तुम किताब लेकर मरना,ख़ाली हाथ नही।भीड़ तुम्हारे सर को झुकाएगी मगर तुम सर किताबों में झुकाना।अपनी सोच को पच्चीस साल आगे की बनाओ।न डरो,न डराओ,उन सबसे पीछा छुड़ाओ जो तुम्हारे जज़्बातों की दुकान पर सौदेबाज़ी करते हैं।बस इंसानियत के लिए काम आओ,खूब पढ़ो,बेख़ौफ़ पढ़ो,बेलौस पढ़ो।यही रास्ता है, कठिन वक़्त का मुश्किल रास्ता।दांते,लेनिन,मोहम्मद साहब,हज़रत अली,चार्वाक,चाणक्य,राहुल सांकृत्यायन,रामानुजम,अरस्तू,सुकरात,प्लेटो,न्यूटन,कलाम,आइंस्टीन,जाफ़र सादिक़ और दूसरे सभी दानिश्वरों को अपनी ज़िन्दगी में सितारों की तरह टाँक दो।यह बात हर कमज़ोर होते समाज के लिए है, मेरा यक़ीन जानो रास्ता निकलेगा...

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