देखो बड़ी सादी सी चीज़ है की वर्ग केवल दो हैं, एक शासक और दूसरी जनता,मज़दूर नही। शासक किसी भी हाल में कुर्सी तक पहुँचेगा, फिर चाहे उसे विचार का लबादा ओढ़ना पड़े,चाहे धर्म की चादर डालनी पड़े। जनता को नीचे ही रहना है, शासक की दी हुई चीजों का उपभोग करके खुद में खुश रहना होगा।
यह बात सब जगह लागु होती है, कोई भी तरह की शासन व्यवस्था हो। शासक बर्गलाएगा,जनता बहकेगी। हो सकता है एक वक़्त बाद इनसे लोगों का मन भर जाए तब वह अपने लिए दूसरा शासक चुनेंगे,फिर वह भी उनपर शासन करेगा।
यह बिल्कुल वैसे ही चलता रहेगा जैसे हम खुद के लिए ईश्वर चुनते हैं।फिर उस ईश्वर से डरना शुरू करते हैं।उसके बाद उसके विरुद्ध बोलने पर खुद को सज़ा भी देते हैं। हम भीड़ में अपने हाथों से संगठन बनाते हैं, वह संगठन हमे डराता है।हम डरकर उसके नीचे काम करते हैं। यही तो जनता है। जनता की नियति में हो है की वह आज इनके पीछे तो कल उनके पीछे चले।
हमे पता है मेरी बात बहुत से सिद्धांतवादियों को ठीक नही लगेगी मगर एक बार वह भी देखें की वह जनता हैं या शासक। अगर किसी के पीछे वह भी चल रहें हैं तो खुद को जनता ही समझें। मेरी बात को सिर्फ इतना समझो,धर्म,वर्ग,जाति में उन्हें उलझने दो जिन्हें उलझना है। खुद को शासक बनाने के लिए तैयार करो। कल तुम खुद शासन की डोर थामो फिर चाहे वह वर्तमान व्यवस्था से हो या व्यवस्था बदलनी पड़े।
ज़मीन पर मौजूद दो वर्गों में एक वर्ग चुनो। शासक बनो। हाँ इतना कर सकते हो की बेहतर शासक बनो,ताकि जनता को तक़लीफ़ कम हो मगर नज़रिया बड़ा साफ़ रखो।पढ़ो,सीखो,बनाओ,वह सब सीखो जिससे आने वाले कल को शासन कर सको।जो कमज़ोर होगा वह मज़बूत का भोजन बनेगा ही,यह प्राकृतिक का नियम है।यक़ीन न हो तो उनको देखो जो कल तक मज़बूत थे आज उनका कोई नाम लेवा नही। जो आज मज़बूत हैं, वह कल तक कमज़ोर भी थे।इसी चक्र में अपनी गति तय करो और जब तक ऊर्जा रहे शासन करो,वरना जनता बनकर खुद के लिए चुटकी भर सुक़ून की आस लगाए,भगवान के नाम की माला फेरो..
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