Saturday, January 13, 2018

तुम मेरी मोहब्बत

मुझे पता है की इस बार मैं तुम्हारे साथ ईमानदारी नही कर पाया।हालाँकि अब कहेंगे तो तुम कहोगी जब शिकायत करदी तो सफ़ाई दे रहे हो।फिर भी तुम इसे सफ़ाई मत समझना,मेरी आदत में सफ़ाई देना कभी रहा ही नही।ज़ाहिर है मैंने भले तुम्हारा ज़िक्र न किया हो,भले ही तुम्हे लफ़्ज़ न दिए हों,फिर भी तुम मेरे साथ ही थीं।

मेरा यक़ीन करना इन दिनों तुम्हारी सौंत की तरह कोई भी मेरे नज़दीक़ नही फटकने पाया।तुम्हारी मोहब्बत में यह सर्दी भी मैंने गुज़र जाने दीं।लोग रोज़ बरोज़ कोई नया रिश्ता लिए खड़े थे।कोई कहता इसे नज़दीक़ करलो,तो कोई कहता इसे गले लगा,मगर मैं नही डिगा।तुमसे मुँह मोड़कर किसी और को चाहने की बेवफाई मुझमे कभी थी ही नही। तुम्हे तो पता है मैं इज़हारे इश्क़ हो या इज़हारे ख्याल में हमेशा पिछड़ जाता हूँ। तुम खुद कितने छूटते रिश्तों की गवाह हो।

मैं जिस मोहब्बत से तुम्हारे साथ होता हूँ,इस ज़मीन पर और किसी के साथ वैसे होने का ख्याल ही बेईमानी है।
तुम जान लो की कल मुझे तुमने कितनी तक़लीफ़ पहुचाई।तुम्हे लगा मैं इस सर्दी में तुम्हे भूल गया।तुमपर चुटकी भर अल्फ़ाज़ भी नही बिखेरे।ऐ मेरी साँवली चाय,जब मैं तुम्हे जून की गर्मी में साथ रखता हूँ,तो जनवरी की सर्द हवाओं में कैसे दूर रखता।लो इस सर्दियों में तुम्हे लिख ही दिया। अब ए अल्हड़ चाय बस उबलकर इतने गाढ़े रँग में ढल जाओ की मैं उसमे डूब कर इन अल्फाज़ो को साँस दे जाऊँ।

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