Thursday, April 12, 2018

जलियावाला

हाँ उस रात चूल्हे नही जले थे।हर चूल्हे की रख ठण्डी थी,बर्तन ख़ाली थे।चूल्हों और घर के बाहर फैली मायूसी देख तुम फ़र्क नही कर सकते थे की यह मुसलमान का घर है या हिन्दू का या सिख का।लोग लड़ते जा रहे थे,रोते जा रहे थे।उनका लड़ना धर्म के लिये नही था,उनके आँसू किसी धर्म के रँग के नही थे।उनका एकमात्र लक्ष्य था भारत।मैं जब उस जगह लम्बे अरसे बाद गया तो उस माटी को चूम लिया।
जी चाहा कोई तो रास्ता दिखे की इसकी धूल में मिट जाऊँ।जब जब कोई निरीह,मासूम मरता है मुझे जलियावाला बाग़ याद आ जाता है।मेरी आँख में आँसू तैर जाते हैं की बहुत बार हमे हमारे हक़ों के लिए मरना पड़ता है।

13 अप्रैल हमारे पुरखों के संघर्ष का भी दिन है।जलियावाला बाग़ में अपने हक़ की लिए शहीद होने का दिन।इतना समझ लीजिये।जिस दिन अपनी आज़ादी के लिए इस हद तक तैयार हो जाएँ की मौत रुकावट न लगे,उसी दिन से सामने वाले की उलटी गिनती शुरू।जलियावाला बाग़ ने उसमे भी मोहर लगा दी की जब कोई निरीह का ख़ून बहाता है।तो वह बहा हुआ ख़ून उसके तलवों में चपक कर तब तक निशान छोड़ता रहता है जब तक वोह पूरा साम्रज्य खत्म न हो जाए।हर ख़ून का हिसाब ईश्वर लेगा।हर अन्याय का अंत निश्चित है।

कल जलियावाला में हमारे पुरखों ने भी हथियार नही उठाए थे,आज जब हम सब बलात्कार और हत्याओं का विरोध मोमबत्ती जलाकर कर रहें,तो वही परम्परा पर हैं ।हिँसा से दूर अंत तक अन्याय का विरोध ।आज भी यह अल्फ़ाज़ हमे उसी बाग़ में खड़ा कर देते हैं और कहते हैं अन्याय,अधर्म और पाप से लड़ते हुए शहीद हो जाओ मगर अपने पुरखों को शर्मिंदा मत करना....
जलियावाला बाग  देखो यहीं चली थी गोलिया
ये मत पूछो किसने खेली यहाँ खून की होलिया
एक तरफ़ बन्दूके दन दन एक तरफ़ थी गोलिया
मरनेवाले बोल रहे थे इन्क़लाब की बोलिया
यहा लगा दी बेहनोने भी बाज़ी अपनी जान की॥
आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की।।

No comments:

Post a Comment