जब सोने की चमक महलों को रोशन कर रही थी।शुद्दोधन और महामाया कपिलवस्तु की खूबसूरती निखार रहे थे।महामाया ने जब महल से बाहर कदम रखा तो लुम्बिनी के जँगल में एक बच्चे को जन्म दिया।सिद्धार्थ।वही सिद्धार्थ जो सोलह साल की उम्र में यशोधरा की रूह बना और राहुल का साया बना।वही सिद्धार्थ जिसने शुद्दोधन से कहलवा लिया की बचाने वाला मारने वाले से बड़ा है।
ईसा से 563 साल पहले पैदा होने वाला सिद्धार्थ जब दुनिया का सारा उरूज,चमक,परिवार,दोस्त,खानदान तज कर जँगल में निकला।पैरो में काँटे चुभे,धूल,धूप, बारिश,आँधी,भूख ने तोड़ा मगर वह डिगा नही।हम और आप जब मामूली सी ख्वाहिशों को नही छोड़ पाते तब उसने ज़रूरतों को छोड़ा।जब वह लौटा तब सिद्धार्थ खत्म हो चुका था।दुनिया ने तब गौतम बुद्ध को देखा।
आज बुद्ध पूर्णिमा है, मेंरे गौतम का दिन है।मुझे जिसने बताया इंसान सिर्फ इंसान है, उसमे कोई फ़र्क नही।ख़िदमत सिर्फ ख़िदमत है जो बिना फ़र्क की जाए।मेरे गौतम ने बहुत पहले सत्य, अहिँसा का वह दर्शन दिया जो लोग भूल चुके थे।बुद्ध को पूजने से ज़्यादा बुद्ध को ज़िन्दगी में उतारना होगा।ज़िन्दगी बयानबाज़ी से नही प्रयोग से बढ़ती है।बुद्ध के प्रयोग से।
आइये हम सब बुद्ध से प्रयोग करना सीखा, जिससे हर इंसान की ज़िन्दगी आसान हो जाए।रूहे सुकून पा जाए।दिल की तड़पन और कसक खत्म हो जाए।मेरे बुद्ध के होंटो की मुस्कान के मानिंद यह दुनिया मुस्कुरा दे।सुन लो मेरे बुद्ध।मेरे गौतम।मेरे गौतम बुद्ध।
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