नँगा मत देखना वरना अंधे हो जाओगे ।कुँए में मत थूकना वरना कोढ़ हो जाएगा ।तालाब या नदी में पेशाब मत करना वरना पागल हो जाओगे ।तकिया पर मत बैठना वरना दाने निकल आएँगे ।झाड़ू पर पैर मत धरना वरना याददाश्त चली जाएगी ।मकबूलन बुआ बचपन से यही बताती रहीं।निरी जाहिल मकबूलन हर चीज़ में एक एहसास भर देती,जो दिमाग़ में बस जाता ।
फिर एक रोज़ क़स्बे में कुछ लोग दाखिल होते हैं ।वह पूरी जाहिल आबादी को बताते हैं की कैसे अपने मज़हब को सुधारो ।मकबूलन को छोड़ सब सुधर जाते हैं ।वहीं दूसरी गलियों में धर्म को सुधारने वाले टहलने लगते हैं ।अपने इंसानी हाथों से दैवीय धर्म की रक्षा के तरीके बताए जाने लगते हैं ।
मकबूलन जिसे न अपनी क़ौम का पता और न धर्म का ज्ञान,बस इतना पता था की कुँए में थूकने से कोढ़ हो जाता है।पकड़िया के पेड़ की जड़ में लेटी वह हर एक को बस यही बताती ।एक रोज़ क़ौम और धर्म को सुधारने वाले आपस में एक दूसरे को क़त्ल करके अपने अपने ईश्वर की रक्षा करने निकल पड़ते हैं।
हफ्तों के दंगो फ़साद के बाद जब सब खुशियाँ जलकर राख हो गईं तब जाकर क़स्बा शाँत हुआ,साथ ही पकड़िया के पेड़ के नीचे भी शाँति हो गई ।
पास के कुँए में खूब फूली हुई,सफ़ेद बालों वाली मकबूलन पानी में उतरा रहीं हैं,बड़ी बड़ी आँखे आसमान की तरफ खुली हुई हैं। ।पकड़िया की जड़ में पड़े पलँग की तकिया ख़ाली है, पास में ही झाड़ू पड़ी है ।कुँए में नँगी बूढ़ी मकबूलन को देख न कोई अँधा हुआ और न ही कुँए में उसे फेंक कर थूकने वाले कोढ़ी हुए ।
क़स्बा मकबूलन को झुठला कर आगे बढ़ चुका है।
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