मृत्यु चाहे कितने सन्नाटे में आए,चाहे कितने ही शोर में आए,उसके आने की आवाज़ हर एक सुन सकता है, सिवाए उसके,जिसके पास वह आ रही हो ।कभी समन्दर के शाँत पानी में आए, तो आसमान में दहकते जहाज़ में आए या मैदानों में उपजे भयंकर शोर में आए,वह आती है और एक झटके में मेरे जिस्म से गोश्त का एक टुकड़ा नोच ले जाती है । अब मुझे मृत्यु डराती नही है, विचलित नही करती हैं, मैं अब मृत्यु के आने पर चीख़ता नही हूँ,मैं रोता नही हूँ,मैं हँसता भी नही हूँ,अब जब यह आती है तो मैं पत्थर हो जाता हूँ ।
तब तक पत्थर हो जाता हूँ जब तक मनुष्य इस आई हुई मृत्यु के तमाम बहाने बनाकर,एक दूसरे को कोसकर,एक दूसरे के लिए मृत्यु का रेड कार्पेट बिछाकर सो नही जाते,तब तक मैं पत्थर रहता हूँ ।
मेरी आँख से निकले आँसू को आँख के कोर से निकली गर्मी सुखा देती है ।वह जैसे ही कहती है, तुम अब तो बह निकले,तुम तब क्यों नही बहे थे,आँसू सिमटकर भाँप बनकर बिना बहे ग़ायब हो जाते हैं ।
मृत्यु ने मेरे आँसुओं से रिश्ता तोड़ लिया है ।मेरे ही क्यों,हर एक के आँसुओं से रिश्ता तोड़ लिया है ।अब आँसू वहीं आते हैं, जहाँ उनका खुद का कोई मृत्यु की गोद में जा रहा होता है ।मृत्यु ने इंसानों को बाँटकर चैन की साँस ली है ।अब उसे पता है की उसके आने जाने पर भीड़ नही आएगी ।अब कोई सावित्री मृत्यु का पीछा कर सत्यवान के प्राण नही ले जा सकती ।सावित्री के पीछे खड़ी उसे ताक़त देती भीड़ धर्म,जाति, विचार में इतना बंट चुकी है की अब मृत्यु किसी भी सत्यवान को जब चाहे खींच ले जाए,सिवाए सावित्री के कौन दो क़तरे आँख से बहाएगा भला ।
मृत्यु अपने कँधे पर ढेरों ज़िन्दगियों को एक झटके में लाश में बदल कर जा रही है । हम उसे जाते हुए देख रहें हैं ।गिद्ध जिसे इंसान कहते हैं की खत्म हो गए,तो ज़ाहिर है हर खत्म होती चीज़ को सम्भालना इंसान का ही कर्तव्य है ।तो इंसान खुद अब गिद्ध हो गया है ।मृत्यु जब उन सबको ले जा रही है तो इंसान से गिद्ध बने लोग,अब रो नही रहें हैं बल्कि अपने बीच बचे इंसानों के कपड़े नोच रहें हैं ।वह इनकी खाल नोच देना चाहते हैं ।वह गिद्ध भी हैं और इंसान भी,इसलिए पहले इंसान बनकर मृत्यु के आने का नया रास्ता बना रहें,उसके जाने के बाद,अपनी सदियों से दबी भूख मिटाएंगे यह गिद्ध ।देखो मृत्यु जा रही है, तुम्हे उसकी पीठ दिख रही होगी,मुझे उसके घुटने दिख रहें .....
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