Wednesday, October 24, 2018

रफ़ी अहमद क़िदवई

लखनऊ और कानपुर से होते हुए वह दिल्ली आए । हमेशा की तरह मसेहरी पर लेट गए और उनके इर्द गिर्द कुर्सियों पर लोग बैठ गए । यह हमेशा का दस्तूर था की जब वह हों तो उनके दोस्त,रिश्तेदार और कांग्रेसजन उनके इर्द गिर्द बैठे रहते थे । आज 24 अक्टूबर की सुबह भी वह ऐसे ही सफेद चादर पर बैठे थे मगर इस बार उनके इर्द गिर्द दोस्तों के साथ एक डाक्टर भी बैठे थे,जो बार बार ताकीद कर रहे थे आज आप बिस्तर से उठियेगा नही रफ़ी साहब ।
उधर एक गाड़ी रफी साहब के घर के सामने आकर रुकी । सुभद्रा जोशी दिल्ली कांग्रेस की एक बड़ी मीटिंग जो रफ़ी साहब के ही लिए रखी गई थी,उसमे ले जाने आ गई । सुभद्रा जोशी को जरा भी अंदाज़ा नही था की डाक्टर ने उन्हें बिस्तर से उठने को मना किया है और आसपास बैठे किसी की हिम्मत भी नही हुई की रफ़ी साहब को उनके किये वादे को तोड़ने को कहे । कुछ दिन पहले दिल्ली से लखनऊ जाते वक़्त वह सुभद्रा जोशी से कह कर गए थे की वह लौटकर उनकी 24 अक्तूबर की मीटिंग में जाएँगे । सुभद्रा जोशी ने भी कहा था की अगर उनकी तबियत ठीक नही हुई तो मीटिंग कैंसिल कर दी जाएग । उस रोज़ जब सुभद्रा जोशी ने रफी साहब से पूछा की आपकी तबियत कैसी है तो वह बोले एकदम ठीक है मगर सुभद्रा, तुम तो वक़्त से पहले आ गई,तुमने तो मीटिंग का टाइम दूसरा बताया था । सुभद्रा जोशी बोली की हाँ गलती हो गई मीटिंग का वक़्त थोड़ा पहले दे दिया गया ।

खैर उन्होंने घड़ी उठाई,शेरवानी पहनी और टोपी लगाई  और सुभद्रा जोशी के साथ कार में बैठ गए । उनके इर्द गिर्द बैठे हर एक ने उन्हें जाता देखा मगर किसी ने हिम्मत करके रोकने की गुस्ताखी नही की । कार मीटिंग की तरफ जाती रही और वह कार का शीशा खोलकर ताज़ी हवा लेने के लिए बाहर झाँकने लगे दूसरी तरफ सुभद्रा जोशी बैठी इत्मिनान में थी की आज आख़िर वह दिन आ गया,जब उन्होंने ऐसी मीटिंग रफ़ी साहब के लिए रखी है जिसका शोर वह महीनों से मचाए थीं । सुभद्रा ने उनका स्टेज नेहरू जी के स्टेज की तरह भारी तैयार करवाया था । हमेशा खुद बहुत तेज़ गाड़ी  चलाने वाले रफ़ी साहब ने ड्राइवर से कहा भाई कुछ तेज़ गाड़ी चलाओ सुभद्रा के लोग इंतज़ार कर रहे होंगे और वह मुस्कुरा दीं ।

रफी साहब कार से उतर कर स्टेज पर पहुचे तो लोगों में जोश आ गया और रफ़ी अहमद क़िदवई जिंदाबाद के नारे गूँजने लगे । किसी तरह लोगों के जोश को कम करके रफ़ी साहब ने बोलना शुरू किया,भाइयों और बहनों,तभी एक खांसी आई । कुछ और बोले और खांसी आई । चेहरा लाल हो गया और खाँसी तेज़ होती गई । तो नीचे से आवाज़ आई रफी साहब आप आराम कर लीजिये आपकी तबियत ठीक नही लग रही । कुछ कार्यकर्ता उनको मदद देने के लिए पहुचे उन्होंने रोक दिया । वह दो चार अलफ़ाज़ बोलकर नीचे उतरने लगे तो सीढियों पर किसी ने सहारा दिया । उन्होंने उससे कहा हटो,मैं खुद चल लूँगा । वह आकर कार में बैठे और उन्हें अस्पताल ले चलने को किसी ने कहा मगर वह बोले घर चलो, तेज़ी से घर की तरफ बढे । किसी ने कार से उतारने के लिए मदद का हाथ बढ़ाया उन्होंने झटक कर कहा,मैं खुद चल लूँगा ।

उसी मसेहरी के बिस्तर पर वह आकर खड़े हुए जहाँ से सुबह निकले थे,तो फिर किसी ने सहारा दिया तो वह फिर बोले हटो और घड़ी हाथ में लेकर वक़्त देखा और कहा हटो,वक़्त हो गया और उसी सफ़ेद चादर पर धम्म से लेट गए । जहाँ से उन्हें कोई नही उठा सका । हर एक की मदद करने वाले हाथ बिना किसी की मदद लिए हमेशा के लिए मसेहरी के दोनों ओर फैल गए । सुभद्रा दौड़ी दौड़ी पीछे आई उनसे लड़कर यह कहने की जब तबियत ठीक नही थी तो वह क्यों गए,मगर सुभद्रा जोशी को पहली और आखरी बार लड़ने का भी मौका रफी अहमद किदवई ने नही दिया...यह जनाज़ा मसौली जाने से पहले दिल्ली का है जहाँ हज़ारों लोग उन्हें आख़री विदाई देने आए ।उनके जनाज़े को मसौली ले जाने की ज़िम्मेदारी लाल बहादुर शास्त्री को दी गई ।जो पूरे रास्ते रोते रहे और कहते रहे रफ़ी साहब उठिये,देखिये लोग आपको देखना चाहते हैं, एक बार सिर्फ एक बार देखना चाहते हैं.......

शायद पुश्तैनी असर था की हमारे दस्तरख्वानो पर कोई भी आकर बैठकर खाने लगता और कोई उससे पूछता भी नही की वह कौन है । जो होता,जितना होता उसमे सब खाकर खुश रहते ।
रफ़ी अहमद किदवई जब दिल्ली में होते तो उनकी खाने की मेज़ पर कोई भी आकर बैठ जाता और उसके सामने प्लेट रख दी जाती बिना यह जाने की वह कौन है । कहाँ से आया है । घर में किसी की भी हिम्मत नही होती की वह यह पूछ ले की तुम कौन हो,क्योंकि पता नही वह रफी साहब का कितना अपना हो । किसी की तफ्तीश उन्हें वैसे भी पसन्द नही थी ।
खाने की मेज़ पर ही उनसे मदद मांगी जाती या कोई काम होता जिसे वह पूरी कर देते । एक रोज़ उनके आने से पहले एक शख्स आकर उनकी मेज़ पर बैठ गया । कोई ने उसे पहले कभी नही देखा था । उसके सामने प्लेट रख दी गई । उसने एक पर्ची निकाल कर रफी साहब की प्लेट के नीचे दबा दी । रफ़ी साहब आए और उन्होंने सबको एक नज़र देखा,सलाम दुआ हुई,फिर वह खाना खाने लगे । प्लेट के नीचे पर्ची देखकर उठाई और पढ़ी । पढने के बाद अपने प्राइवेट सेक्रेटरी को दी और कहा यह आज अभी पूरा हो जाना चाहिए । हाँ पूरे महीने की शेविंग का सामान लाकर देना,एक बार का नही ।उन्होंने सर उठाकर उन लोगो की तरफ भी नही देखा जिनमे से किसी एक ने यह पर्ची रखी थी । चुपचाप बिना यह जाने की वह कौन है,कहाँ से आया है,हिन्दू है या मुसलमान है । औरत है या आदमी है । कांग्रेसी है या कोई और है ।बस सर झुकाकर उसकी मदद करदी और खाना खाकर उठ गए । उन्होंने अपने पुरखों से सीखा था की मदद करते वक़्त आँख मत उठाना की मदद लेने वाले की आँख में शर्म आ जाए । वह अजीब घर थे,जिनकी चौखट पर कभी कुछ कम नही पड़ता था ।

अलीगढ़ पढ़ने के दौरान अपनी फ़ीस से दूसरे साथियों की फीस जमा कर दिया और खुद का नाम कट गया । इतनी ख़िदमत,इतनी मोहब्बत और इस क़दर मदद करके वह दिलों में बाक़ी रह गए ।तस्वीर में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद अन्तिम दर्शन करते और दूसरा वह भाषण जो राष्ट्रपति वीवी गिरी ने उनकी जयंती पर दिया..मेरी आज कोशिश रही की यौम ए वफ़ात पर कुछ लिख दें,कुछ ज़िक्र करें ।हमारे बस में इतना भर ही है बाकि किरदार में ढालना है......

रफ़ी अहमद किदवई यूँ तो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक बड़ा जाना पहचाना हुआ नाम हैं.उनकी उससे बड़ी पहचान पार्टी लाइन और तमाम सीमाओं से परे जाकर लोगों की मदद करने की रही है.उनपर अपने विरोधियों की मदद करने के खूब आरोप लगे मगर उन्होंने कभी इसे कम नही होने दिया क्योंकि उनकी नज़र में मानवता पार्टी और बंधन से ऊपर की चीज़ है.उनकी इसी खासियत का जवाहरलाल नेहरु बेहद सम्मान भी करते थे मगर एक बार उनके मदद करने  से ऐसा हुआ की पूरी पार्टी ही विचलित हो गई.खुद नेहरु जी भी बेहद परेशान हो गए.
हुआ यह की रफ़ी साहब ने अपनी पार्टी कांग्रेस के खिलाफ निर्दलीय उम्मीदवार गोविन्द सहाय जी की आर्थिक मदद कर दी. गोविन्द जी खुद नेहरु जी के बेहद करीबी रहें हैं.किसी कारणवश यह आजाद ख्याल गोविन्द सहाय जी कांग्रेस के ही खिलाफ चुनाव लड़ गए.रफ़ी साहब से उनकी अच्छी दोस्ती थी. चुनाव की तैयारी के लिए उन्होंने रफ़ी साहब से मदद मांगी जिसको पूरा करने का वादा रफी साहब ने कर लिया.उनकी आर्थिक मदद की भी मगर यह मदद कांग्रेस के अन्दर एक भूचाल ले आया.अमूमन रफ़ी साहब के किसी कदम में ऊँगली न उठाने वाले जवाहरलाल नेहरु भी पार्टी के दबाव में आकर रफ़ी साहब को तलब कर बैठे.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की इस महत्वपूर्ण मीटिंग में रफ़ी साहब पर आरोप लगा की उन्होंने पार्टी लाइन के विरुद्ध जाकर एक उम्मीदवार की मदद की है,जो कांग्रेस को हरा सकने के लिए खड़ा है.जवाहरलाल जी ने रफ़ी साहब से पूछा. राफी साहब भी इस स्थिति की गंभीरता को समझते हुए बोले,मुझे बेहद अफ़सोस है.मैं बेहद शर्मिंदा हूँ.बाकी नेतागड़ रफ़ी साहब के इस अपराधबोध पर खुद की विजय मानकर मंद मंद मुस्कुराए.रफ़ी असाह्ब ने आगे कहा की,”मैं माफ़ी मांगता हूँ गोविन्द सहाय जी से की जितनी मदद का मैंने उनसे वादा किया था,उतनी मदद मैं उनकी कर नही पाया.आइन्दा से पूरी मदद करने की कोशिश करूँगा.यह कहकर रफ़ी साहब बैठ गए और जवाहरलाल नेहरु खूब मुस्कुराए क्योंकि रफी साहब के दिल को एक वह ही तो समझते थे.यह किरदार था हमारे पूर्वजों का,जिसे हमे सीखकर दोस्त हो या दुश्मन हर एक की मदद करने के लिए आगे आना चाहिए.

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