Sunday, October 21, 2018

लनतरानी

कल बहुतों ने पूछा की यह लनतरानी क्या है, तो सुनें
"मैं भागता चला जा रहा था की ओबामा टकरा गए।ओबामा की मुझसे लड़ते ही सीने की हड्डी टूट गई।टूटने की आवाज़ से आसमान चटख गया।इतने में नीचे बैठी मनिहार ने आवाज़ दी मुझे।मैं दो क़दम में ज़मीन नाप कर उस तक पहुँचा।उसकी आँखों में आँखे डालकर मैंने ट्रम्प को शक्ति दी।ट्रम्प वोह शक्ति पाकर झेलम में जैकेट पहने लेटे मगरमच्छ के मुँह को अपने हाथों से फाड़ने लगा।मगरमच्छ की यह हालत देख कोरिया का गोली लौंडा जो खुद को तानाशाह समझता है, डर गया।उसके डरने से जो पसीना निकला वोह अरब में बारिश बनकर बरसा ।
बारिश का पानी बहते हुए कब ज़िल्ले इलाही की नाक में समा गया ईश्वर ही जाने।ज़िल्ले इलाही ने चन्द्रशेखर आज़ाद से इस नाक में भर चुके पानी के बारे में पूछा,आज़ाद कड़क कर बोले यह नेहरू की गलती है । नेहरू तमतमाकर बोले की मैं जा रहा हूँ बादलों से झगड़ने और शेरवानी ऊँची करके बादलों की ओर एक क़दम बढ़ाया की बादलों में बैठे इंद्र सकपका गए और उन्होंने नीचे हिरोशिमा पर एक बम फेक दिया,बम के गिरने से सब धुँआ धुआँ हो गया,फिर धुएँ को चीरते हुए एक महामानव प्रकट हुआ,जिसका सीना असामान्य रूप से चौड़ा था,जिसका इतिहास का ज्ञान अकाट्य था,उसने मुस्कुराकर कहा यह भी बन्द,वह भी बन्द,सब बन्द,चुप करो,ऐसा पैसा,नोट सोट, कपड़े लत्ते,ख़ुशी वुशी,सुक़ून फुकुन सब बन्द"

यह जो आज लिखा है इसको बिलकुल उल्टा सीधा मत समझयेगा की क्या लिख दिया है।यह ही लनतरानी है।कल इस शब्द को इस्तेमाल किया था।यह अवध की वोह खूबसूरत कला थी जो ताँगेवाले से लेकर ज़मींदार तक सबको आती थी।यह इतनी आम थी की घरों में जब कोई ज़्यादा झूठ बोलता या बढ़ा चढ़ा कर कुछ कहता तो उससे कह दिया जाता था की ज़्यादा लंतरानी न सुनाओ।अब तो अवध की चौखट पार करके यह अमरीका तक चली गई है।
खैर लंतरानी के मज़े लें।हम तो दिनभर लंतरानी कहने की कूव्वत रखते हैं।क्योंकि इस आर्ट को ज़िंदा रखना है।इसकी महफ़िलों को ज़िंदा रखना है।अवध के आखरी चराग़ की राख अभी हमारे माथो पर लगी हुई है।लंतरानी ज़िंदाबाद।आजकल इसके उस्ताद दुग्गल साहब की भी ज़िंदाबाद।

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