उसके हाथ में ताज़ा ताज़ा प्लॉट आया था।ज़मीन का सबसे शानदार टुकड़ा।उसने उसमे शानदार घर बनाने का ख्वाब देखा।झट से शहर के सबसे क़ाबिल आर्किटेक्ट से नक्शा बनवाया।वोह चाहता था,उसका घर शहर का सबसे नायाब घर हो।उसके घर में सारी सुविधाएँ हों।वोह सोचता था की उसके घर में उसके रहने वाले अपने,बेहद खूबसूरती से रहें।
घर में खूबसूरत टायल्स लगाए गए।छतों को पीयूपी से सजाया गया।नल की टोटियाँ भी हज़ारों की थीं।घर की खिड़कियाँ ऐसे खुलती थीं की सबको हवा मिले,किसी का कहीं भी दम न घुटे।सबके हिस्से में सूरज की रौशनी आए।सबके जिस्म को कुदरत की ठण्डी ठण्डी हवा लगे।
घर बनकर तैयार हो गया।शुरू शुरू में बनाने का हौंसला कुछ दिन चला।फिर जैसे जैसे लोग मरते रहे,वक़्त गुज़रता रहा।घर को संवारने का हौसला जाता रहा।कल तक एक एक नोक पलक रखने वाला अब बहती टोटियाँ पर भी ध्यान नही देता।झड़ती पीयूपी पर भी उसकी नज़रें नही ठहरती।दीवारों पर जमती काली काई भी अब उसके हौसले को नही जगाती।अब उसका दिल भर चुका है।नए बच्चे उसकी हर कोशिश पर अब सवाल कर रहें ।बहती टोटी पर कह रहें यहाँ फला ब्रांड की टोटी लगाई होती । यह दीवारों का रँग दूसरा किया होता । यह दरवाज़े इतने ज़्यादा क्यों हैं । घर बनाने वाला बूढ़ा बेचैन लेटा गिरता हुआ प्लास्टर देख रहा ।
ठीक ऐसा ही होता है एक देश।उसके बनते वक़्त बड़े हौंसले होते हैं, फ़िक्रें होती हैं, एक संविधान बनता है।संवैधानिक संस्थाएँ बनती हैं । संविधान जो सबको खुली साँस देता है।धीरे धीरे वोह बनाने वाले लोग मारते जाते हैं और देश घर की तरह पुराना होता जाता है। नए आए लोगों का इनके बनने से मतलब नही होता,उन्हें ईंट ईंट जोड़ने का एहसास ही नही होता,वह तो नया अनुभव लेना चाहते हैं, ईंट ईंट तोड़ने का अनुभव । बनाने वालों के सारे हौंसले मर चुकते हैं अब सिर्फ फिक्रमन्द लोग लेटे लेटे उसे बूढ़ा होने देते हैं।वोह लोग,जिन्हें निर्माण का न और छोटी ई की मात्रा भी नही पता।वोह घर की मोटी मोटी दीवारों पर, कव्वे के गू के साथ आए बीज से उगे, पकड़िया का पेड़ की तरह होते हैं।
जो ऊपर से ही धीरे धीरे मज़बूत होकर,चौड़ी चौड़ी दीवारों पर फैलता जाता है और एक रोज़ महलों की दीवार को भी ढहा देते हैं।इस तरह एक खूबसूरत घर खँडहर बनता है।हाँ खण्डहर।हमारे पुरखों का खण्डहर।उनके ख्वाबो का खण्डहर।उनकी उम्मीदों का खण्डहर।अब बस देखना यह है की यह शानदार घर,खण्डहर हमारे सामने होता है या हमारे बच्चों के।हमारी दीवार पर पकड़िया का पेड़ बड़ा हो चुका है। उसकी शाखाएँ घर के हर हिस्से की नीव तक पहुँच चुकी हैं । इसकी आहट हर कमरे से उठती बेचैन चीखों से मिल रही है । एक शानदार विरासत को ढहाने उस भयंकर पेड़ की शाखाएं ज़मीन में लगने लगी है....
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