सच पूछिये तो हमे ही समझ नही थी ।वह बार बार कहते की फलाने ने सत्तर साल लूटा और हम इसमें छिपी टीस ही नही पहचान पाते थे । उन्होंने सत्तर साल के किसी भी काम को ज़बान पर लाने की गलती नही की और सिर्फ लूट लूट ही कहते रहे ।
तब भी हमारा ध्यान नही गया और हम इन कर्णप्रिय रसपूर्ण वक्तव्यों में मन्त्रमुग्ध होकर नाचते रहे । अब दिख रहा उनका लक्ष्य क्या था,लूट । वह सत्तर साल की लूट को ही लक्ष्य मान रहे थे और पाँच सालों में उसे पूरा कर लेना चाहते थे ।उन्होंने सत्तार सालों में किसी काम से मुकाबला नही किया सिवाए लूट के और बहुत हद तक पछाड़ भी दिया ।
जब पी साईनाथ ने कहा की प्रधानमन्त्री फ़सल बीमा योजना ,रॉफेल से बड़ा घोटाला है तो दिल बैठ गया । पुराने बहुत से बयान पलटे तो देखा वह तो हर ब्यान में लूट का ही ज़िक्र कर रहें । तब सर पीट लिया की भय्या उनकी नज़र बुरे ही कामो पर थी,उनका लक्ष्य भी तो वही था ।भरम में तो हम थे ।
सत्तर साल में बने एक भी यूनिवर्सिटी के जैसी कोई यूनिवर्सिटी नही खोली,कोई बैंक नही खोला,कोई संस्थान नही बनाई हाँ मुकाबला ज़रूर किया,अपने लक्ष्य को पा लिया । मुझे पी साईनाथ की रिपोर्ट ने झकझोड़ दिया क्योंकि देश में दो चार ही लोग हैं जिनपर हम यक़ीन करते हैं । यक़ीन इसलिए क्योंकि उन्हें भीतर बाहर से जानते हैं ।यक़ीन इसलिए क्योंकि उनकी आत्मा और अपनी आत्मा को एक ही रास्ते से चली देखते हैं ।
यही भला है की हमसे कोई यह नही पूछता की जब सत्तर साल लूट मची थी,तब तुम कहाँ थे । कोई कमअक्ल अगर यह पूछ भी ले तो हम यही कहेंगे जब बाबर भूमि कब्ज़ा रहा था तब तुम कहा थे ।जब अशोक लाखों को मार रहा था तब तुम कहाँ थे ।जब वही अशोक हथियार छोड़ ज्ञान बाँट रहा था तब ही मुट्ठी भर ले लेते,तब कहाँ थे,जो यहाँ मूर्खता का मुकुट लगा मटक रहे हो । ख़ैर जो है तो हइये है,हमे पता है लूट कभी हमारा मुद्दा होती ही नही क्योंकि लूट का सबसे बड़ा तन्त्र ही हमारी कमज़ोरी है, धर्म ।।
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