Friday, November 2, 2018

एक दर्द

मुझे लगता है मेरा दिल मटकी में पकने वाला गोश्त का टुकड़ा है ।जो मिटटी की सौंधी खुशबू के साथ पल पल पक रहा है । मटकी अंगारों पर रखी धीरे धीरे गर्म हो रही और मेरे दिल से धीरे धीरे पानी बाहर आ रहा । लोग इस पानी और आग में जली मिटटी और गोश्त की खुशबू सूँघ मदहोश हो जाएँगे । एक रोज़ मेरा दिल पक जाएगा और लज़्ज़त के भूखे लोग उसके रेशे रेशे को खींचकर निगल जाएँगे ।

यही तो इश्क़ का वह मकाम है जहाँ से ऊंचाई हार जाती है ।जहाँ से ग़म दम तोड़ देता है ।जहाँ से खुशियाँ अपने अंदर से खुशियाँ खत्म कर देती हैं ।यह कैफ़ियत सदियों में एक आध बार एक आध जिस्म में होती है । जब वह जिस्म अपने नज़दीक़ बैठी रूह से कहता है की मैं जिन्हें जानता हूँ ,वह तुम्हे जानते हैं ।तुम उन्हें नही जानते,जो तुम्हे जानते हैं । तुम हमे जानते हो,जो तुम दोनों को जानता हैं । इस जानने में मिटेगा हर एक मगर पहले वह तहस नहस होगा जो सब जानता है ।

ख़ैर दिल भीना भीना हांडी गोश्त बनने को तैयार है और रूह रत्ती भर भी बेचैन नही । किसी ने बहुत पहले पूछा था की सबसे बेमुरव्वत कौन,तो बिना पल गवाए कहा था,रूह । जब शरीर कमज़ोर होगा तो यह छोड़ देगी,जब ज़ख़्मी होगा साथ छोड़ देगी,जब दर्द होगा तो इसे भगाओ,यह बेहिस सी नज़दीक़ ही बैठी रहेगी । जब चीखकर कहो की मेरे बदन से निकल जाओ,तो यह चिमट कर कहेगी अभी नही,अभी तो तुम्हारे सब्र से काँपते हुए होंट देखने हैं ।अभी सुर्ख़ डोरियों के गुच्छे में बदलती तुम्हारी आसुंओं से तर आँख देखनी है । सच पूछो कमबख्त रूह बड़ी बेमुरव्वत है । मैं लिख रहा हूँ,वह नाख़ून से भुनते होए गोश्त की खाल नोच रही है ।

यह क्या है । यह क्यों लिखा । कहना क्या चाहते हो ।बस यही की तुम समझो जो तुम्हारा सौदा कर चुके हैं, उनकी गोद में तुम नन्हे बच्चे सा मुस्कुरा रहे हो । तुम जो कभी अकेले हो तो कभी भीड़ में हो,कभी खुद को क़ौम में जोड़ते हो तो कभी मज़हब में जोड़ते हो,तुम समझो जो लिखा नही जा सकता ।तुम महसूस करो जो बोला नही जा सकता । बताओ की तुम्हे कैसे बताऊँ की हर जागती आँख जाग नही रही होती और सोती आँख सो नही रही होती । बताओ की कैसे बताऊँ की दिमाग़ की कौन सी नस दबाऊँ जो तुम्हे रात में पर्दे के पीछे मिलते हाथों का हाल दिख सके । बताओ की कैसे बताऊँ जो कँधे पर हाथ है तुम्हारे मोहब्बत और हिफाज़त का,उसी हाथ की आस्तीन में खन्जर है,जिसपर तुम्हारा नाम नक़्श है । यह एक फ़लसफ़ा है, समझो तो पार,वरना डूबना तय है ।डूबने से पहले मटकी में पकते मेरे गोश्त की लज़्ज़त लेते जाना और जो ज़ायका आए वह यहाँ कहते हुए डूबना.....

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