Monday, July 10, 2017

प्रेम गीत

हाँ तो मैं अब प्रेम गीत लिखूँ।वह गीत जिसमे बच्चों की भूख मत हो।वह पंक्तियाँ जो गरीब के ज़िक्र से गरीब न हों।ऐसा गीत जिसमे बेकसूरों की मौत की चीख़ न हो।मैं चाहता हूँ झर झर झड़ती बारिश पर लिखूँ।मदमस्त भौरों पर लिखूँ।मन्द मन्द हवाओं को लिखूँ।मेरे लिखने में चीखें एक बाधा है।जब मैं भौरों की आवाज़ सुनता हूँ तो मुझे भीख माँगते बच्चों की भिनभिनाहट सुनाई देती है।कैसे लिखें प्यारे भौरों पर।मेरी कलम बारिश की हर बून्द को समेट लेना चाहती है मगर उस औरत के आँसू मेरी कलम को खट्टी कर देते हैं।मैं सावन की बिखरी हरियाली पर कलम धरना चाहता हूँ मगर बर्फ़ में बिखरी लाशें मेरी सियाही जमा दे रही हैं।

मैं फूलों को छूकर अपनी कलम में सियाही भारना चाहता हूँ मगर ज़मीन से उठती भीनी भीनी नफ़रत की गर्मी मेरे फूलों को कुम्हला देती है।तुम्ही बताओ मैं कैसे प्रेम गीत लिखूँ।वक़्त घटता जा रहा है, कलम सूखती जा रही है, कोई यह जल्दी से तक़लीफ़ की बदसूरत तस्वीर को हटाए ताकि मैं झट से उठकर प्रेमगीत लिखूँ।जिसमे श्रृंगार रस का अनन्त रस भरा हो।जाओ कह दो अब मैं लिखूंगा वह गुलाबी गुलाबी गीत जिसे पढ़ वह खूबसूरत होंट मुस्कुराएंगे।जिनके शब्द खूबसूरत गालों को छूकर खुशबू बिखेरेंगे।

जाओ मैं तुम्हारी परवाह नही करता।मैंने भूख,चीख,तड़प, प्यास,टूटन,बिखरन,मौत सबसे मुँह मोड़ लिया है।हाँ हाँ तुम समझ लो यहाँ मेरे अंदर का इंसान मर चुका है और मेरा कवि हृदय ज़िंदा होकर आज कालजयी प्रेमगीत रचने वाला है।वह गीत जो कभी नही लिखा गया।ख़ून से सनी ज़मीन में खड़ा मैं आज नफ़रत से भीगी सियाही से वह अमर प्रेम गीत लिखने वाला हूँ जो मेरी कलम को अमर और मुझे मरा हुआ बना देगा।मेरे हाथ अब रोज़ रोज़ बेकसूरों की मौत की आवाज़ सुनकर हरकत करना बन्द कर चुके हैं।कफ़न से ढकी सात आठ लाशें अब मुझे किसी कॉपी के सादे वरख से लगते हैं।मैं इनपर प्रेम गीत लिखने वाला हूँ।खुद के अंदर हल्की सी बची इंसानियत को मारकर अमर प्रेम गीत की रचना बस चन्द लाश दूर है....

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