भला होए मुए अंग्रेज़ों का जो आए तो कम से कम एक आध चीज़ ढंग की दे गए।ई जो दो चार पसलियों के बीच फंसा दिल है न,ई सिर्फ अंग्रेज़ों की एकही बात पर छलाँग मारता है वह है चाय।
ज़रा सोचें की अंग्रेज़ चाय की पत्ती को सुखाकर उबालना और उबालकर पीने का जादूई पानी न दे गए होते तो क्या होता।एक बार तो हमे लगा की अगर असम के खेत की जगह अवध की चौखट पर चाय के पौधे उगे होते तो इतना तो जान लें की अंग्रेज़ों के मुँह से ख़ून आ जाता तब भी वह चाय पिला न पाते।
जानतें हैं क्यों,क्योंकि अवध की औरते तो हर हरी पत्ती देख चटनी बनाने में माहिर हैं।चाय की पत्ती में लस्सुन,मिर्चा, नमक मिलाकर सिल पर पीस देती और मोटी रोटी के साथ थाल सजा देंती,लीजिये चाय की चटनी और फलानी रोटी।अँगरेज़ भी सर पीट लेते और चाय भी अपने द्रव अवस्था से गारा अवस्था में आ जाती।
ई ही लिए कहते हैं अँगरेज़ बड़ा उपकार किहिन की पहले ही पीने का पूरा तरीका सिखा गए,वरना पक्का चटनी ही मिलती।खैर चाय में दूध मिलाकर हमने उसे अपनी गोरा करने वाली खसलत में तो ढाल ही लिया है।अंग्रेज़ों को लगता था की हम काली चाय पियेंगे,बदअक़्ल,जब हम चमड़ी गोरी करने के लिए अलानी फलानी लवली क्रीम का बाजार बना सकते हैं तो चाय काली पियेंगे,दूध मिलाकर उसे भी गोरा कर लिया।।गोरी गोरी घोसी वाली चाय।।।
सच में मैं सोचकर ही डर गया था की अगर चाय इस रूप में हमे न मिलती तो हम इसे कैसे इस्तेमाल कर रहे होते।न होता तो एक आध तम्बू वाले वैद्य इसकी डंठल से दातून बनाकर दाँतो को चमकवा रहे होते या कोई पुराने खानदानी हक़ीम मर्दाना कमज़ोरी का इलाज भी इसी के काढ़े में ढूंढ लाते।खैर अंग्रेज़ों ने ई सबसे अलग हमे एक बढ़िया पेय दिया और हमे वैसे भी हर चीज़ को उधिया कर लेने की आदत है तो हमने सुबह की पहली किरण से शाम को दम तोड़ते सूरज और रात को चांदनी उगलते चाँद तक इस चाय को अपना लिया और ज़रूरी काम की तरह वह ज़िन्दगी में शामिल है।दो वक़्त के खाने के साथ तीन वक़्त की चाय जड़कर हमने चाय को बराबर बैठा लिया।मेरे मामले में तो कमबख्त चाय मोहब्बत है, हाँ मोहब्बत....
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