चढ़ी अर्श पर उमराव जान
फ़रिश्ते आए हैं अयादत को।
उमराव जान की कब्र पर उमराव ने यह शेर पत्थर पर तराशा हुआ था।उमराव ने अपनी ज़िन्दगी में आखरी शेर गढ़ दिया था।मशहूर शायर और स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी हसरत मोहानी की भी मज़ार पर उनका ही एक शेर तराशा हुआ था।बहुत सी मज़ारों का रुख कीजिये तो मनो मिटटी के नीचे दबे इंसान की सोच को बताते शेर झलक जाएँगे।यह एक चलन था की जो यहाँ सोया हुआ है उसकी ज़िन्दगी का एक ऐसा शेर उसकी मज़ार पर तराश दिया जाए जो उसके जाने के सैकड़ों साल तक उसकी सोच की खुशबू को बिखेरता रहे।
खैर मैं न शायर हूँ और न ही कुछ।पता नही कब्र की मिटटी हिस्से में आएगी भी या नही।पता नही कहीं जलाकर या पीट पीट कर मार दिया जाऊँ और यह गोश्त के हिस्से किस किस तरफ फ़ेंक दिए जाएँ।पता नही कहीं पानी में बह जाऊँ।हो सकता है बोलने की वजह से नानाजान की तरह तोप से ही उड़ा दिया जाऊँ,खैर अब तोप नही तो दूसरे अच्छे साधन हैं जिस्म को फ़ना करने के।नानाजान की कब्र पर अंग्रेज़ों ने शेर नही मगर एक लक़ब दर्ज किया था "बागी"।।खैर मुझे अगर ज़मीन का कुछ फिट हिस्सा मिला तो उस पर शेर नही लिखा होगा और अगर सरकार हुज़ूर ने बागी वागी आतँकी नक्सली देशद्रोही जैसे लक़ब नही दिया तो मैं चाहता हूँ मेरी कब्र पर पत्थर पर मेरे यह अल्फ़ाज़ लिखें हों-
" मैं मरने से पहले ज़िंदा था और आप ?"
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