Wednesday, July 12, 2017

बारिश बिरहीं अंदरसे

बारिश में सिर्फ फलेंदे ही नही आते।पीले मेढक भी तो दिखते रहते हैं।वैसे जब बारिश का ज़िक्र होता है तो प्रकृति की उपज के ही इर्द गिर्द हम ठहर जाते हैं।कभी हरियाली तो कभी फल तो कभी कीड़े मकौड़ों के ज़िक्र से ही खुश हुआ करते हैं।
बारिश जो हमारे दिलों में आती है, उसे भी तो अल्फ़ाज़ मिल ही जाते हैं मगर जो बारिश हमारे बावर्चीखानों में आती है उसका क्या।।

चार बून्द गिरी नही की ज़बान बेसन प्याज़ की पकौड़ी के नाम से कुलबुलाने लगती है।पकौड़ी न भी हो तो चाय तो बारिश साथ ही लेकर आती है।अगर हम बारिश को नज़दीक़ से देखें तो यह पकौड़ी से बहुत आगे निकल चुकी होती है।हमारे घरों में सादे से पराठे चने की दाल से प्रेग्नेंट होकर बिरहीं बन जाते हैं।बारिश में बिरहीं का खाया जाना भी तो एक बेहतरीन शगल है।भले पड़ोस में बाढ़ आई हो मगर बिरहीं के क्या कहने,ज़बान ऐसे बहकाती है जैसे बिरहीं न बनी तो बारिश फ़िज़ूल है।

खैर बिरहीं से जब दिल भर जाए तो ज़बान मीठे की तरफ राल टपकाती है और नंबर आता है तिल्ली से मेकअप किये अंदरसे का।।।बारिश हो और अंदरसे की गोलियाँ न हों तो बारिश को क्या कहें,सिर्फ कीचड़।।रुदौली के अंदरसे तो अपने आप में अव्वल हैं।मुझे तो लगता है रुदौली में मजाज़ के बाद कोई मशहूर हुआ तो वह अंदरसे ही हैं जिसने मजाज़ के जज़्बात से निकले अल्फ़ाज़ पर अपनी मिठास उड़ेल दी।खैर हम भी बकरी चराने लगे।बात कहाँ की कहाँ पहुँचा दी।

हाँ तो बारिश में घर में या बाहर बनने वाले उन पकवान को खींचकर घर तक ज़रूर लाइए जो आपने बचपन में खाया होगा।यह पकवान परम्परागत तरीके से अगली पीढ़ी तक जाने चाहियें।इनका ज़िक्र होना चाहिए ताकि यह भी पता चले हमारे बुज़ुर्ग हर मौसम का कैसे लुत्फ़ लेते थे।मुश्किल से मुश्किल वक़्त में भी वह ज़िन्दगी के मज़े लेकर मुस्कुराते रहे और उनमे से छोटी छोटी खुशियाँ ढूंढकर उन्हें बड़ी ख़ुशी बनाते रहे।
यह हैरान परेशान नौजवान मौसम मुस्कुराना ही तो भूल गए हैं।ठहाके तो हैं मगर उनमे फीकापन है।हँसी तो है मगर बनावटी।।।सबके साथ बैठकर हर मौसम की खूबी के पकवानो को चखिए।मज़े लीजिये वरना बारिश तो आती जाती रहेगी ही।लुत्फ़ नही उठाएँगे तो सड़क पर सिर्फ कीचड़ ही तो नज़र आएगा जो दिन बदिन बढ़ता जा रहा है।।।

No comments:

Post a Comment