जिन्हें समाज सेवा करनी है या राजनीति दोनो को यह खत पढ़ना चाहिए । नेहरू को गांधी का ख़त, वह भी तब जब नेहरू अपने पिता के धन से हटकर अपने पैरों पर चलना चाहते हैं ।यह दौर हम सबकी ज़िन्दगी में आता है, तब देखिये नेहरू को मांझने वाले उन्हें क्या रास्ता दिखा रहें हैं। गाँधी लिखते हैं-
[मुझे अपने पिताजी पर आर्थिक भार बनकर रहना दुखदायी मालूम होता है और इसलिए मैं अपने ही पैरों पर खड़ा होना चाहता हूँ । कठिनाई यह थी की मैं कांग्रेस को पूरा समय देने वाला कार्यकर्ता था । मेरे पिता जी ने जब यह सुना तो उन्हें बड़ी परेशानी हुई :नेहरू ]
प्रिय जवाहर,
दिल को छूने वाला तुम्हारा निजी पत्र मिला । मैं जानता हूँ इन सब चीजों का तुम बहादुरी से सामना करोगे ।अभी तो पिता जी चिढ़े हुए हैं और मैं बिल्कुल नही चाहता कि तुम या मैं उनकी झुँझलाहट बढ़ाने का ज़रा भी मौका दें । सम्भव हो तो उनसे जी खोलकर बातें करलो और ऐसा कोई काम न करो,जिससे वह नाराज हो । उन्हें दुःखी देखकर मुझे दुःख होता है ।उनकी झुँझलाहट उनके दुःख की अचूक निशानी है । हसरत आज यहां आए थे ।उनसे पता चला कि हर कांग्रेसी के कातने सम्बन्धी मेरे प्रस्ताव से भी उन्हें अशांति होती है ।
मुझे ऐसा महसूस होता है कि कांग्रेस से हट जाऊं और चुपचाप तीनों काम करने लगूँ । उनमे जितने भी सच्चे स्त्री पुरुष हमे मिल सकते हैं, उन सबके खपने की गुंजाइश है । लेकिन इससे भी लोगों को अशांति होती है । पूना के स्वराज्यवादियों से मेरी लम्बी बातचीत हुई । वे कातने को भी राज़ी नही और मेरे कांग्रेस को छोड़ देने से भी सहमत नही । उनकी समझ मे यह नही आता कि ज्योंही मैं अपना स्वरूप छोडूंगा,मेरा कोई उपयोग नही रह जाएगा । यह भद्दी स्थिति है, मगर मैं निराश नही हूँ । मेरा ईश्वर पर विश्वास है । मैं तो इतना ही जानता हूँ कि इस घड़ी मेरा क्या धर्म है, इससे आगे का मुझे मालूम ही नही । फिर मैं क्यों चिंता करूँ ।
क्या तुम्हारे लिए कुछ रुपये का बंदोबस्त करूँ?तुम कुछ कमाई का काम हाथ मे क्यों न लेलो ?आखिर तो तुम्हे अपने ही पसीने की कमाई पर गुज़र करनी होगी,भले ही तुम पिताजी के घर पर रो । कुछ समाचार पत्रों के संवाददाता बनोगे ?या अध्यापकी करोगे ?
सप्रेम
मो.के.गांधी
15 सितम्बर 1924
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