Thursday, January 17, 2019

मंटो

गुज़री रात सोचा की लिखें,सुबह सोचा की लिखें,दोपहर में सोचा की लिखें,शाम में सोचा,सोचते सोचते रात हो आई।जनाज़ा सामने रखा रहा,कुछ कहानियाँ मक्खियों की तरह कफ़न पर भिनभिना रहींथीं।उठकर उन्हें उड़ाता की ऊँगली में फंसे अल्फ़ाज़ गिर जाते।

होते होते रात हो आई,कहानियाँ अब उड़कर अपनी अपनी कबरनुमा कोठियों में चली गई,अब मुर्दा सुक़ून से लेटा है।अब अँधेरे में उसके पाँव के पास सर रखकर रोते हुए कह सकता हूँ की ऐ मंटो,तुम भी चले गए।अँधेरे में चीखकर कहूँगा की आज मंटो मर गया,चलो उसका सोग मनाते हैं, उससे पहले की सुबह कहानियाँ फिर उड़कर आएं, चलो उसे कब्र में दफना आएं, शायद मंटो वहाँ सुक़ून पा जाए...
अच्छा भला मंटो को कब्र में भी सुकून कहाँ होगा ।लेटा लेटा वहां भी कहानियाँ बुन रहा होगा ।हश्र के रोज़ वह ख़ुदा के सामने इन कहानियों को खोलेगा । जब वह मुर्दों पर से सड़कर झड़ते कफ़न और उससे बाहर आते नंगे जिस्म की सच्चाई लिखेगा तो कौन कहेगा कि मंटो,मुर्दो को तो कपड़े पहने दो । जब मंटो के जिस्म को कीड़े खा रहे होंगे तो वह तड़प नही रहा होगा बल्कि कह रहा होगा और आओ,हमे नोच नोच खाकर अपनी भूख मिटा लो,तुमसे पहले और इस क़ब्र के ऊपर भी लोग हमें नोच रहे थे ।अपनी भूख मिटा रहे थे ।जब उनकी भूख मिट गई तो मुझे यहां कब्र में तुम्हारे सामने फेंक दिया ।

ए कीड़े मकोड़ों आओ और जल्दी जल्दी मुझे नोच लो अगर तुम जिस्मो में मज़हब का परहेज़ न करते हो  ।
मैं यही सोचता रहा कि मंटो को आखिर सुकून कहाँ होता,तब मंटो ने एक जोरदार हाथ मारने की आवाज़ मुँह से निकाली, क्योंकि मंटो तो चींटी भी नही मार सकता था तो हाथ क्या मारता । चीखकर बोला, सुकून होता तो मंटो मर जाता ।बेचैनी है, तो मंटो है, जब तक बेचैनी रहेगी मंटो मरेगा नही...उसकी मौत का दुख मत मनाओ बस बेचैन फिरते रहो, मंटो बेचैनी के पीछे पीछे चलता जाएगा.....

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