Thursday, January 10, 2019

धर्म खतरे से बाहर है

हमारा धर्म खतरे में है . यह तो हम सब हमेशा सुनते ही रहते हैं. कभी कोई बोल देता है तो कभी कोई .क्या कभी हमने यह सोचा है की धर्म खतरे में कब होता है और कब खतरे से बाहर आ जाता है.आखिर वह कौन सी ताक़त है जो नगाओं के धर्म पर खतरा नही ला पाती,सूफियों के धर्म पर खतरे के बादल नही ला पाती .आखिर धर्म उनका ही खतरे में क्यों होता है जिनका सब कुछ धर्म पर टिका हो मगर उनमे धर्म ही न हो .जिसमे धर्म होता है उसमे तो और कुछ हो भी नही सकता तो उसे भला कोई कैसे ख़त्म कर सकता है.
कभी कुम्भ को देखिये तो एहसास होगा हजारों साल से चला आ रहा यह कुम्भ नागाओं से कभी खाली नही रहा.उनके पास कभी कोई शिकायत नही रही.उनमे कभी कोई डर नहीं रहा.उनमे कभी कोई लालसा नही रही.क्योंकि धर्म उनके अंदर उतर चूका है.धर्म जिसके अंदर होगा वह न तो डरेगा और न ही ललचाएगा और न ही कमजोर होगा.
यही बात हमें भी माननी चाहिए की जब धर्म हमारे दिलों में होगा तो भला कौन सी संसार की ऐसी शक्ति है जो उसे हमारे दिलों से निकाल ले जाए.वह कौन है जो हथियार के जोर पर हमारा दिल जीत ले जाए.यह जान लीजिये की धर्म कभी खतरे में रहा ही नही बल्कि धर्म की आड़ लेकर सत्ता में आई शक्तियों का धर्म ही कमजोर हो सकता है हमारा आपका नही.क्योंकि हमारे दिलों से कोई प्रेम कैसे निकाल सकता है,कोई समर्पण कैसे निकल सकता है,कोई हमसे त्याग कैसे छीन सकता है.कोई हमारे दिलों में पैबस्त आध्यात्म कैसे खत्म कर सकता है.
हो सकता है उनका धर्म खतरे में हो जो धर्म की गलत व्याख्या करते हैं.जिन्हें यह सत्ता का साधन लगता है वह तो खतरे में होंगे ही क्योंकि यह एक ऐसा बीज है जो किसी दिल में बो दिया जाए तो उसमे सबसे पहले नफरत दम तोड़ती है.जिस दिल में नफरत रह जाए उसमे धर्म का रहना मुमकिन ही कहाँ है भला.जिस दिल में डर रह जाए उसमे धर्म का गला घुटेगा वह भला डरे हुए दिल में क्यों रहे .कभी सुना है भला की रौशनी अँधेरे से डरती है,बल्कि रौशनी से अँधेरा घबराता है. तो धर्म जिसके अंदर होगा वह न तो खतरे में होगा न डरा हुआ होगा.डरेगा तो अधर्म .
जो खतरे में है वह धर्म तो नही  बल्कि अधर्म है . जैसे सीता के सामने रावण खतरे में था. निहत्थे बुद्ध के सामने अंगुलिमाल डाकू खतरे में था.कर्बला में हुसैन के सामने यज़ीद खतरे में था.मूसा के सामने फ़िरऔंन खतरे में था.कृष्ण के सामने कंस खतरे में था.ईसा के सामने पूरी हुकुमत खतरे में थी.जहर का प्याला सुकरात के हाथ में था मगर खतरे में सत्ता थी.यह हर दौर में होता आया है जो धर्म पर है, वह भला खतरे में कहाँ है,खतरे में तो अधर्म ही रहा है और उसी का सर्वनाश हुआ है.
जिसका धर्म पर यकीन है वह बहकता ही नही क्योंकि उसे पता है जो उसके अंदर है उसे दुनिया की कोइ ताक़त नहीं निकाल सकती.जब आपको अपने अंदर मौजूद यह रौशनी कमजोर लगने लगे तो वाकई यह खतरे में है.तब आपको किसी की भी जरूरत नही बल्कि अपने हृदय में प्रेम और त्याग का हवा पानी डालना चाहिए ताकि आपके हृदय में रोपित यह पौधा निरंतर बढ़े.
धर्म और अधर्म के बीच एक महीन रेखा होती है जिसे नही जाना तो पता नही कब आप अधर्म के मैदान में खड़े हो जाएँ पता भी नही चलेगा.धर्म पूजा पद्धति,कर्मकांड या दूसरी चीजों से नही चलता और न ही बढ़ता है.धर्म तो चरित्र से चलता है और उसके बढने से बढ़ता है और घटने से घटता है.जब कोई कहे की इकट्ठे हो जाओ धर्म खतरे में है तो फौरन रुक जाओ.कहने वाले का चरित्र देखो और अपने अंदर मौजूद धर्म देखो.जब तक तुम्हारे अंदर धर्म जिंदा है उसे कोई खतरा नही है.जब तक तुम धर्म के मर्म को समझ रहे हो तब तक यह हरगिज़ खतरे में नही है.जैसे ही तुम किसी दुसरे के कहने पर अपने दिल के अंदर बिना झांके हाथ उठाकर कदम बढ़ाते हो वैसे ही धर्म खतरे में आ जाता है.यह भी सच मान लो तब भी केवल तुम्हारे हृदय का धर्म खतरे में आता है,सबका नही .अपने दिल में धर्म लाओ दुसरे के दिल में जैसे ही यह लाने निकलोगे तो गलती कर जाओगे

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