जब हम ज़बान,ज़ायके और ज़िन्दगी की गिरह सुलझा रहे थे।हर चीज़ के बनने बिगड़ने में प्रयोग कर रहे थे।जब इंसान और जानवर के दरमियानी फासला कम था।तब उसने एहसास कराया की हम इंसान हैं।उसने बताया दो हाथ और पैरों का सिर्फ यह काम नही है की खाना और खाना।हमे अपने इर्द गिर्द हर चीज़ के लिए जीना होगा।हम ख़ुदा की बनाई हर शय की हिफाज़त और ख़िदमत के लिए हैं।
उसने ज़बरदस्त राजसी ज़िन्दगी को ठुकराया।जंगलों में टहला, भूख और प्यास में उस ताकत का एहसास किया जिसने हमारी रूहों को बनाया।ज़मीन में बिछे काँटों ने तलवों में चुभकर दिल की गाँठे खोल दी।हर वक़्त शहज़ादे की तरह हिफ़ाज़ती दस्ते से घिरा वोह जब जँगल का रुख कर गया तो उसके इर्द गिर्द जानवर थे।बातें करने के लिए पेड़ थे।एक सन्नाटा था जो सभ्यता में शोर पैदा करने को बेताब था।राजसी लाव लश्कर तो सब छोड़ते हैं उसने तो तन के कपड़े तक को उतारकर प्रकृति से प्रकृति जैसा बनकर दिखा दिया।
हर तरफ बिखरे घने जँगल में रुई से मुलायम बदन को बरगद की खाल सा सख़्त कर लिया।मुझे हैरत है की जब हमसे एक मामूली से रुमाल का मोह नही छूटता,पंखे की ज़द से हम बाहर नही जाना चाहते,कुछ हो न हो रौशनी को तो हम नही ही छोड़ सकते।तब कैसे उसने एक झटके में सब ऐसे उतार फेका जैसे वोह उसे क़ैद कर रहा हो।उसने ज़िन्दगी को इतना तपाया की उसका जिस्म कुंदन हो गया।
ईसा मसीह से 599 साल पहले उसने दुनिया को एक विचार दिया।ऋषभ देव से चली सीढ़ियों में 24वें नम्बर पर उसने रौशनी दिखाई।वैशाली में त्रिशला और सिद्धार्थ के आँगन में वह वर्धमान पैदा हुआ।जिसने अपनी ज़बरदस्त वैचारिक ताकत से और तप त्याग से दुनिया के सामने महावीर स्वामी नाम दिया।अहिंसा,सत्य, अपरिग्रह,अचौर्य और ब्रह्मचर्य के वह पाँच नियम दिए जिनके सामने ज़माना झुक गया।जँगल ने नगरों को जीने का सलीक़ा दिया।
मैं महावीर स्वामी की जूझने,समझने,प्रयोग,तप,त्याग को देखता हूँ,सोचता हूँ हज़ारों साल पहले यह कैसे मुमकिन था,लोगों को,आदिवासियों को इंसानियत से कैसे जोड़ा उन्होंने।आज सब कुछ है मगर हम चाह कर भी इंसान को इंसान होने का एहसास नही करा पा रहे हैं।जानते हैं क्यों,क्योंकि हममे महावीर का रत्ती भर भी सच,लगन, त्याग,समर्पण नही है।आइये आज महावीर जयंती में महावीर को याद करने की जगह उन्हें ज़िन्दगी में उतारे।जिनके दिल में वाक़ई महावीर होंगे,या जो महावीर को समझते होंगे,उनके दिल से सबसे पहले नफ़रत अलविदा कह जाएगी,फिर दिखावा,शान शौकत जाएगी।यह हरगिज़ नही चलेगा की तन के तो कपड़े उतार दिए मगर मन संकीर्णता,हिँसा,बदले और लालच से ग्रस्त हो।मेरे महावीर मन ही को तो देखेंगे..
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