जिससे तुम प्रेम करो,उसपर इसे प्रकट मत होने दो,अगर तुम शासक हो । यह बात हसन अली सूर अपने बड़े बेटे को दे रहे थे । बता रहे थे तुम्हे चाहे जितना प्रेम हो,चाहे जितना इश्क़ टूटकर आए मगर बेटा इस खुशबू को ज़ाहिर मत होने देना,क्योंकि जो ज़ाहिर हो गया,तो तुम्हारे दिल की डोर तुम्हारे दिमाग से हटकर तुम्हारे प्रेमी के हाथ मे चली जाएगी,जो एक शासक के लिए आत्मघाती है ।
हसन अली अपने बेटे से कहता था कि यह बात मैं पुरखों के सुने सुनाए मंत्रो की तरह तो कह ही रहा हूँ,भुगत कर भी कह रहा हूँ । तुम तो जानते हो मेरी तीसरी बीबी और तुम्हारी दूसरी सौतेली माँ से मैं किस कदर मोहब्बत करता हूँ । जो बात मैने तुम्हारी माँ से नही की वह इससे कहदी और तुम जानते हो कि वह मुझे जिधर चाहती है,उधर घुमाती हैं । मैं उसकी मोहब्बत में अपने दिमाग पर ताले लगा बैठता हूँ । उसका कहना है कि मैं तुमसे जागीरें छीन लूँ और तुम जानते हो मैं छीन लूंगा क्योंकि दिल से कमज़ोर हूँ बेटा ।
उस बेटे ने जागीर गवाने के बाद भी पिता हसन अली की इस बात को गांठ बांध लिया,हर शासक को बांध ही लेना चाहिए । जो मोहब्बत कमज़ोरी बन जाए,वह शासन को टुकड़े टुकड़े कर देती है । मोहब्बत ही है जो हारे हुए सिपाहियों को अक्सर वज़ीर बनाकर राजपाट चौपट करवाकर दम लेती है ।
मैं इश्क़ को पूजने वाला हसन अली की इस फिलॉसफी को मानू भले ही न मगर शासक या उस वर्ग जो शासन करने जा रहा से ज़रूर कहूँगा की अपने दिल और दिमाग की डोर किसी और हाथ मे मत देना । वैसे पिता पुत्र का यह ट्रेनिंग सेशन होता बड़ा लाजवाब था । जब बेटा बाप को सिखाता था कि जनता में अपने लिए मोहब्बत कैसे पैदा की जाए । जगह कैसे बनाएं उनके दिलों में ।
यह बेटा कोई और नही हिंदुस्तान का बादशाह शेरशाह अली था । दो गांवों की जागीर छिनने पर बाप की तरफ से मिली नसीहत को गिरह बांधकर उसने इतने बड़े शानदार मुल्क की हुकूमत की डोर अपने हाथ लेली ।
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