"मुझे लगता है कि अब हमें अलग अलग हो जाना चाहिए"
रूह ने जिस्म से कहा और जिस्म रूह की इस फरमाइश को इकटक देखता रहा । उसने रूह से नही पूछा की जब तुम मेरे सहारे अपनी खुशबू का एहसास करवाती थीं,वह लम्हे भूल गईं ।
जिस्म ने नही कहा कहा कि ए रूह,तुम जानती हो तुम्हारे निकलते ही मैं सड़ने लगूँगा, क्या तुम उस जिस्म को सड़ने छोड़ दोगी जो कल तक तुम्हारा घर था । मुझे मालूम है लोग तुम्हारे बाद मुझे मरा हुआ कहेंगे, क्योंकि वह जानते हैं कि जो है, वह रूह है ।
जबकि हर एक को पता है, रूह जो कहना चाहती थी,वह ज़ुबान कहती थी । जो सोचना चाहती थी,वह दिमाग सोचता था । जो देखना चाहती थी,वह आंखे दिखलाती थीं । जो करना चाहती थी,वह हाथ पैर करता था । मगर एहसान फ़रामोश रूह एक झटके में यह सारे बन्धन तोड़ निकल जाएगी ।
जिस्म ने तड़प कर कहा कि रूह,ए रूह,तुम्हे लग रहा कि तुम मुझे छोड़कर जा रही हो,हरगिज़ नही,तुम मुझे मारकर जा रही हो ।मुझे देखो,सब कुछ होते हुए तुम्हे रोक नही पा रहा हूँ ।
ए रूह जाते हुए एक बात फ़िज़ाओं में उड़ाते हुए चली जाना कि जब रूह नही रहती तो जिस्म चाहे जितना खूबसूरत और तबदरुस्त हो,सड़ने लगता है । फिर वह चाहे धर्म की रूह प्रेम और त्याग हो,देश की रूह मानवता,प्रेम और सहिष्णुता हो,जैसे ही यह निकलेगी इसका जिस्म धर्म और मुल्क दोनो सड़ने लगेंगे ।
रूह हँसी और बोली,वाह रे मेरे पुराने मकान मालिक,ए जिस्म,तू मरने जा रहा है,सड़ने जा रहा है और अब भी उस जगह की फिक्र कर रहा,मानवता की बात कर रहा । अरे अपनी फिक्र कर,मैं चली....जिस्म ने आखरी आँसू पोछा और कहा,अलविदा । मैं यह तो नही कह सकता कि चल दूसरी रूह में मिलेंगे,मगर तू तो जाते हुए कहा सकती है कि चल दूसरे जिस्म में मिलेंगे । जिसे तू अलग होना कह रही,वह अलग होना नही है क्योंकि अलग होने में दोनों ज़िन्दा तो रहते हैं...चल मैं मरने जा रहा हूँ....बिना रूह के मर जाना ही बेहतर भी है..
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