आप हमेशा सिर्फ़ भगत सिंह,महात्मा गाँधी या नेहरू ही क्यों बनना चाहते हैं । आप कभी सरदार अजीत सिंह,सरदार किशन सिंह, करमचंद गाँधी या मोतीलाल नेहरू क्यों नही बनना चाहते । हर परिणाम अपनी ही आंखों के सामने देखने की लालसा हमे गहरे अवसाद में ढकेल देती है । आख़िर हम रास्ता और मन्ज़िल दोनों को क्यो पा लेना चाहते हैं, जबकि जानते हैं कि हमारी लड़ाई सभ्यता की लड़ाई है, हमारी लड़ाई संस्कृति की लड़ाई है, जो एक इलेक्शन या दो इलेक्शन में किसी के हारने या जीतने से तय नही होगी,बल्कि इसमें जिंदगियां जाएँगी ।
भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह को देश से मोहब्बत की सज़ा मांडले (बर्मा) में निर्वासित होकर मिली । पिता सरदार किशन सिंह को नेपाल में पकड़ा गया । यही लोग तो थे,जिनके विचारों से उनके घर मे भगत सिंह का आना तय हुआ । वह करमचंद गाँधी और पुतली बाई ही तो थे जिन्होंने अपने बच्चे को सत्य,अहिंसा और प्रेम के बीज बोए । वह मोतीलाल नेहरू ही तो थे,जो आज़ादी की जंग में कूदकर,एक ऐसा रास्ता बना गए,जिसे उनके बेटे ने गौरव तक पहुँचाकर समृद्ध किया ।
मैं आज बहुतेरों को देखता हूँ,वह देश के हालात देखकर मायूस हैं । वह हिन्दू मुसलमान के नामपर बंटते हुए देश को देखकर इतना टूट चुके हैं कि उनसे मुस्कुराया भी नही जाता । यह इतना हारे हुए लोग हैं कि एक दो चुनाव में यह चिटखकर बिखर जाते हैं । इनसे पूछे कि तुम्हे चुनाव जीतना था या समाज सुधारना । तुम्हे टूटे हुए दिलों को जोड़ना था या उन्हें जोड़कर वोट डलवाना था । अरे,हर अच्छा समय अपनी ही आंखों से देखने को क्यो बेचैन हो,काम करो ,हो सकता है, वह अच्छा वक्त तुम्हारे बच्चों की आंखों के सामने आए ।
बेगम अनीस कहती थीं कि जब देश का बंटवारा हुआ,तो हिन्दू मुसलमान एक दूसरे पर टूट पड़े । पंजाब,दिल्ली,यूपी सब तरफ लोग भयँकर नफरत फैलाते । घर जलाते । औरतों लड़कियों को उठा लिया जाता । उनके घरों में आग लगा दी जाती । यहाँ गांव गांव से मुसलमानों को मारकर निकाला जाता या उनकी घर वापसी कराई जाती,यही हाल सरहद उसपार हिंदुओं,सिक्खों के साथ था । लगता ही नही था कि देश का कोई भविष्य होगा । हम लोग यह सोच भी नही पाते थे कि भारत मे कभी कोई मुस्कुरा पाएगा । बेगम अनीस जैसे सैकड़ो लोग दिन रात काम करते रहे । बूढ़े गाँधी ने इनकी सूखी आंखों में ख़्वाब भरे और कहा काम करो,सब बदलेगा । सब जुट गए राहत शिविरों में,खूब गालियां खाई,इनपर हमले हुए मगर राहत शिविरों में आए हुए लोगों की मदद करते रहे,यही सोचकर कि आज नही तो कल कुछ तो सुधरेगा । सबने देखा कि सब कुछ सुधरा और सन पचास के बाद देश को देखा और नेहरू की मेहनत देखी,लोगों को प्रेम करते देखा,तब दुनिया को एहसास हो गया,बूढ़े गाँधी सच्चे थे । इन सबकी बिना निराश हुए की गई अथक मेहनत से देश पहिये पर आ कर बढ़ गया ।
यह कहने का मकसद था कि जो बुझे बुझे,टूटे हुए लोग हैं । जो निराश हैं कि कुछ भी सही नही हो सकता । वह खुद को सुपरमैन समझने की गलत अवधारणा से बाहर आएँ । वह अपने बच्चों में विचार रोपें,दूसरे बच्चों में रोपें और खुद आख़री तक जोश और हौसले के साथ लड़ते रहे । हो सकता है हम और आप नही,तो न सही,हमारे बच्चों में कोई इस मेहनत का मज़ा चखे । प्रेम कभी भी खाली नही जाता और मेहनत कभी भी रेगा नही जाती । मेहनत कीजिये,काम कीजिये,मायूस मत होइए । निराशा आपके अंदर के वह बीज सुखा देगी,जो आने वाले वक्त में पौधा बनकर वृक्ष बन सकता था । हालात से न निराश हों और न ही निराश करें,यक़ीन करें कि करने से ही बदलेगा । देश और समाज पत्थर हो जाए,तब भी रस्सी बनकर उसे रोज़ रगड़ो । सैकड़ों रस्सियां टूटकर खत्म होंगी मगर कोई तो रस्सी होगी जो पत्थर को घिस जाने का आनंद लेगी...हम नही तो हमारे बच्चे,हमारे बच्चे नही तो उनके बच्चे,कोई तो हमारी आजकी मेहनत से मुस्कुराएगा ही,यक़ीन रखो ।
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