किसी के मुँह से न निकला मेरे दफ़न के वक़्त
कि इन पे खाक न डालो,ये हैं अभी नहाए हुए....
पढ़ते हुए डूबने लगा हूँ, सोच रहा हूँ उस शायर के इन अल्फ़ाज़ पर भी लोगों ने वाह वाह ही तो किया होगा,उसके दिल में बैठी गिरह,भला किसकी नज़र में आएगी । एक लेखक की बदनसीबी होती है कि उसके मौत के एलान पर भी वाह वाह की आवाज़ उठती है, और वह फिर इस नरक में जीने को बेताब हो जाता है ।
मैं गुलाब था,जो अब सूख कर बिखर जाना चाहता हूँ । मेरी मौत के इस फ़रमान पर भी तो लोग दाद ही देंगे । वह कभी नही जानेंगे कि शब्द बिखेरने वाला बिखरी हुई सांसे समेटने में किस क़दर टूट गया है ।
यह बातें जैसे ही मेरे कानों में पड़ी । मैंने इनको सलीके से समेटा और कहा,अपनी कलम से ऐसा पर्दा मत खींचो की दूसरी तरफ से रौशनी ही आना बंद हो जाए । ए लेखक,यह बिखरे बिखरे शब्द बिखर कर और दूर हो जाएं,की इनको समेट लो,की देर हो जाए,की कोई सुनने वाला रह न जाए,की कोई कहने वाला नज़दीक़ न आने पाए,इस कि से पहले उठो और झाड़ू लगाकर दुःख से भीगे इन शब्दों को बहारकर कहीं दूर फेक आओ ।
क्योंकि अब सरकार भी निराशावादियों को पसन्द नही करती । श्रृंगार और वीर रस में डूब जाओ,ताकि कोई तुमपर मिट्टी न डाल जाए,क्योंकि अभी अभी तो तुम नहाए हुए हो ए लाश...ओह सॉरी तुम
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