बहस चलेगी की जुलूस निकलना सही है या नही,ईद ए मिलादुन्नबी दस तारीख़ को है । कोई इसे मानेगा कोई नही मानेगा,दोनो ही बातों से फ़र्क़ नही पड़ता । फ़र्क़ तो पड़ता है कि कौन पैगम्बर मोहम्मद साहब की बात मानेगा । अच्छे अच्छे लोग देंखे हैं, उनकी ज़ुबान और ज़हनियत देखी है, अपने रसूल के किरदार से कोसो मीलों दूर ठीक उल्टा किरदार लिए,रसूल के नाम पर ही आपस मे लड़ते फिरते हैं ।
जो यह कहते हैं की हज़रत मोहम्मद को खुद में उतारो,उनकी बताई बातों को दिल से लगाओ ।उनके दिखाए रास्ते पर चलो ।उनके किये कामो को अपने उसूल बनाओ ।वो भी अच्छे से जानते हैं की यह आसान नही है । वह कह तो रहें हैं मगर ज़रा ज़रा सी मुख़्तलिफ़ बातों से भिनक जाते हैं ।
पैग़म्बर मोहम्मद की ज़िन्दगी को खुद में उतारना इतना ही कठिन है जितना पानी में मिटटी घोलना । जब तुम्हे लगेगा की मिटटी घुल गई,तो ज़रा से वक्फे के बाद वह तलहटी में बैठ जाएगी और पानी फिर ऊपर मुस्कुराता रहेगा । यह आसान भी ऐसा है जैसे किसी बच्चे को देख चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ जाना ।
तुम्हारे लिए तो इतना ही पैमाना काफ़ी है की जब तुम तस्लीमा नसरीन,सलमान खुर्शीद और फ़्रांस के कार्टूनिस्ट की क़लम की सियाही से बेचैन न हो,उनके किये को उनकी सोच समझ माफ़ कर दो,किसी के भड़काने पर बारूद का ढेर मत बन जाओ,जब ऐसा करलोगे तो हज़रत मोहम्मद के पीछे पाओगे ।
जब तुम बाथरूम में हो और एक ज़रूरत से ज़्यादा पानी मत बहाओ,तुम्हे बेवजह बहते पानी को देख दर्द हो,तब तुम उनके रास्ते पर होगे । किसी बच्चे जिसके माँ बाप न हों उसके सामने अपने बच्चों को बहुत दुलार प्यार मत करो की बच्चा अपने माँ बाप की मोहब्बत को बेक़रार हो जाए,तब तुम उनके पीछे होगे ।
फल खाकर छिलके ऐसी जगह मत डालो जिससे कोई को इसके न मिल पाने की ख्वाहिश जगे,जब तुममें यह संवेदना होगी,तब तुम उनके रास्ते पर होगे । पड़ोस में अगर कोई भूखा है और तुम्हारा पेट भर रहा है, तो तुम हज़रत मोहम्मद के रास्ते से कबके हट चुके हो ।
बीमार को तुम देखने नही जाते,इंसान के मिलने पर उसकी खैरियत नही पूछते,बाजार में बैठकर सिर्फ अपने फायदे की फ़िक्र करते हो,दूसरे की अमानत में खयानत करते हो,बेटे को बेटी से ज़्यादा पढ़ाते हो,बेटी को अपनी कमाई में हिस्सा नही देते,बेटियों से ऊँची आवाज़ में बात करते हो,औरत से सख़्त लहजा इस्तेमाल करते हो,बूढ़े तुमसे बात करने,पूछने या कुछ भी कहने में डरते हों तो यक़ीन जानो तुम हज़रत मोहम्मद के जलाए चराग़ की रौशनी के बावजूद एक अँधेरा हो ।
अगर तुम्हारे लफ़्ज़ किसी के दिल को दुखाते हैं । तुम्हारा होना गरीब मज़लूम को दर्द देता है । तुम ज़ुल्म के हिमायती हो ।तुम नौकर और खुद के खाने और पहनने में फ़र्क़ करते हो ,तो चाहे तुम जुलुस निकालो और चाहे सुबहों से शाम मस्जिद में सजदे में पड़े रहो । बावजूद इसके तुम हज़रत मोहम्मद साहब की नज़र से अलग रास्ते पर हो। जिन्हें लगता है की रसूल को वाक़ई ज़िन्दगी में उतारा जाना चाहिए,वह कुछ भले न करें मगर शुरुआत वह तक़लीफ़ पहुँचाने वाले अल्फ़ाज़ से किनारा करके कर सकते हैं ।मोहब्बत है तो मोहम्मद हैं, वरना कुछ भी नही...
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