लखनऊ में एक है लोहिया पार्क और एक है जनेश्वर मिश्र पार्क । वैसे तो और भी पार्क हैं मगर यह दो पार्क लखनऊ के फेफड़े हैं । भर भर कर इसमें पेड़ लगवाए गए,ताकि लखनऊ वासी भर भर के सांस ले सकें ।
वैसे तो यहाँ पूरे शहर में साइकिल पथ भी होता था मगर बदली सियासी आँखों में चुभ गया और उखड़वा फेका गया । कहा गया पैसे की बर्बादी है । मान लिया कि बर्बादी थी,पर आपने कौन सा आबाद करने वाला काम किया । आज जब लखनऊ शहर और सूरज एक दूसरे से मिलने को तड़प रहें हैं, तब ख्याल आया होगा कि साइकिल पथ क्यों था ।बड़े- बड़े पेड़ तो हर एक हुकूमत ने कटवाए मगर कुछ ने उनको कटवाने का प्रायश्चित किया तो कुछ ने भोंडेपन से हँस कर काम चलाया । यह दोनों पार्क हर आने वाले वक्त और ज़रूरी होते जाएँगे ।
वैसे यह अजीब शहर है । मुझे यह शहर बिल्कुल पसन्द नही मगर मैं इससे बेइंतेहा मोहब्बत करता हूँ । पसन्द इसलिए नही क्योंकि इसको जिसने सँवारा उसको इसने तख्त से उतारा है । प्यार इसलिए है क्योंकि इसकी मिट्टी में पहली सांस ली थी,यही शहर ने मेरे माथे पर अपनी मोहर लगाई थी,जो ताउम्र साथ रहेगी । यही वह शहर है जो मेरे साथ साथ चलता रहा,अच्छे बुरे सब हालात में ।
आज जब दम घोटू माहौल है । हवा भी हमारे मिजाज़ सी बदतर हुई जा रही है । ज़हर जो हमारे दिमागों में भरा था अब हवा में फैल चुका है । फिर भी यह शहर उन शख्सियतों की तारीफ़ में दो लफ्ज़ नही खर्चा करता, जो उनको लोहिया-जनेश्वर पार्क जैसे फेफड़े दे गए हैं ।
हम तो इस वक़्त राजनीति से उकता चुके हैं । यही क्या कम भला है कि अभी तक इस धुंध को किसी ने लपक कर "पॉल्यूशन जेहाद" नही कहा अगर ऐसा कोई कह देता तो शायद "एंटी पॉल्यूशन स्क्वाएड" ही नज़र आने लगता मगर ख़ैर, ऐसा कुछ है नही,बस धुआँ धुआँ है ।
पर्यावरण,प्रदूषण,ग्लोबल वार्मिंग, जंगल,ज़मीन यह सब हमारे विषय ही नही हैं । अभी हफ्ते भर में हम बढ़िया से किसी और डुगडुगी पर नाच रहे होंगे । अभी तो बहुचर्चित सुप्रीम कोर्ट का अयोध्या पर फैसला आना है, बस तब ही तक यह स्मॉग स्मॉग खेल लें,उसके बाद तो हवा में हवा ही नही रह जाएगी सिवाए नारेबाज़ीयों के,क्या कहें ।
लखनऊ हो या कोई और शहर,अगर उसे जो चाहिए,उसकी जगह कुछ और दिया जाता रहे,तो यही हश्र होता है । आपको मेरी बातों पर मिर्ची लगे तो लगे,आँख में तो मिर्ची पर्यावरण ने घोल ही दी है । अभी कहते हैं, धर्म जाति से अपनी राजनीति मत तय करो । राजनीति काम से तय करो,जो एक ईंट भी नही रखते,वह क्या जाने निर्माण क्या होता है ।
जाइये और लोहिया पार्क-जनेश्वर पार्क में टहलकर अपने फेफड़ो को ज़िन्दगी दें । चल सकें तो मेरे साथ आइये और धर्म,जाति, हिंसा,भड़काउपन और बाँटने वाली राजनीति से हटकर निर्माण का रास्ता खोलें । जहाँ हवा आपके फेफड़ो को भी सही रखे और दिमाग को भी, ईश्वर से प्रार्थना की यह दिन और न खिंचे,जल्द से जल्द पर्यावरण सुधरे और हम सब निर्बाध ऑक्सीजन ले सकें,जिसमे मिलावट न हो । अब ईश्वर हर वह हाथ मज़बूत करे, जिससे देश समेत हमारे शहर लखनऊ की हवा,पानी और दिमाग भी शुद्ध रहे ।
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