Friday, November 1, 2019

छठ

यूँ हल्की सी सर्द सुबहों और नदी का ठंडा पानी।सूरज की संतरी शक्ल और हमारा नदी में डूबा आधा जिस्म।आँखे बेताब उस सूरज को क़ैद करने के लिए जो हफ्ते भर पहले आँखों को चौंधया रहा था।हाथ नदी के पूरे पानी को समेट लेने के लिए  बेचैन।हल्के हल्के होंटो से झरते गीत।बाँस का सूप,फूँस की डलिया, गुड़ गन्ने का रस और चावल गेहूँ से बना देसी ज़ायका।कुल मिलाकर ख़ालिस हिंदुस्तानी नब्ज़।न मज़हब के रोड़े,न ज़ात की फ़िक्रें,न पुरोहितों के नखरे,न पहुँच से बाहर के देवी देवता।
यही तो छठ है।हमारा आपका छठ।

रामराज्य शुरू होने का छठ।सीता का राम के राजतिलक लगाने का छठ।कर्ण की तपस्या का छठ।द्रोपदी के ताप का छठ।राजा प्रियेवद, महर्षि कश्यप,मालिनी और देवसेना का छठ।गंगा का यमुना के पानी को खुशबू देने का छठ।दो दिलों को जोड़ने का छठ।दो रूहों को रूहों से मिलने का छठ।यह सादे से किसानो,हमारे जैसे आम से लोगों,मज़दूरों का वोह खूबसूरत त्यौहार है जिसकी सौंधी सी खुशबू मगरूर दिल महसूस नही कर सकते हैं।
मेरा मुल्क़ मामूली सी चीज़ों में खुशियाँ ढूँढने वाला रहा है।हमने अपनी नदियों को,अपने खाने को,अपने हिस्से के सूरज को,अपनी जोड़ने वाली संस्कृति को अपने टूटे फूटे अल्फ़ाज़ों में समेट कर, लोकगीत गढ़े हैं।उन गीतों में हमारी रूहें हैं।उन गीतों में मेरा भारत है।

जब नदी में आधा डूबकर हम सूरज को सलाम कर रहे होते हैं, तब हमारे दिल की जो धड़कन होती है, वही तो भारत है।इस छठ को महसूस कीजिये।इसमें छुपी कहानियों को देखिये।इस त्यौहार में मिलने वाले गंगा जमुनी दिल को पढ़िए।तब ही तो भारत की रूह को छू पाएँगे।
आओ इस छठ पर क़सम ले की हम दिलों को इतना बड़ा कर देंगे,जहाँ नफ़रत गुम जाएगी।मेरे राम के रामराज्य की शुरआत का यह जो छठ है, उसके होने को मोहब्बत से सींच देंगे।जैसे ही हम नदी में नारंगी सूरज के सामने डुबकी लगाएँगे,तो यक़ीनन सारी नफ़रत उस खुशबूदार पानी में धूल जाएगी।बस एक ही दुआ,छठ हमारे देश मे प्रेम,सहिष्णुता,एकता और भाईचारे के साथ तरक्की की छटा बिखेर दे...

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