एक बहुत ही स्मार्ट ज़मींदार थे । ज़मीदारी चली गई मगर उनसे काम ढेला भर नही होता था । नौकरी मिलती नही या करने की ख़्वाहिश भी नही रही होगी,बेचारे करते क्या,रोज़ यही सोचते कि कौन यह हज़ार रुपल्ली के लिए मेहनत करे,कुछ ऐसा करेंगे कि पांच हज़ार या पाँच लाख या पाँच करोण एक झटके में आ जाएँगे,यानी आँखों मे पाँच गुने वाले ख्वाब ही बसते थे ।
अब बिस्तर पर लेटे लेटे अपने घरेलू ख़ज़ाने को पाँच गुना बनाने के ख्वाबों में खोए रहते । घर मे अनाज और दूसरी चीज़ों की क़िल्लत होने लगी । जब उनसे पूछा जाए कि बच्चों की फीस कैसे जाएगी,खाना कैसे बनेगा । वह बाहर जाते और दो तीन दिन बाद हज़ार रुपये लाकर पटक देते । घर वाले उनकी स्मार्टनेस में मंत्रमुग्ध से खुश की ज़मींदार साहब उनकी ख्वाहिश एक झटके में पूरी कर देते हैं ।
चलता रहा,साल के साल गुज़रते रहे,फिर एक दिन वही रोना की सरसों का तेल नही,मिर्च नमक नही,आटा नही,अबकी खेत से कुछ आया नही,क्या करें । ज़मींदार साहब ने कहा अम्मा की तांबे वाली डेग बिकेगी अब,घरवाले सन्न, उन्हें अब समझ आया बाग,खेत या जो कुछ भी बाहर बिकने वाला था,वह बेचा जा चुका है, अब घर के बर्तन बेचे जा रहे हैं । धीरे धीरे डेग,पानदान,लगन, भगोने,गिलास,चम्मच सब बिक गए,घर वाले कंगाल अब बिकने के अलावा क्या ही उन्हें सूझे । जिन्हें वह स्मार्ट समझते थे,वह बेचने में स्मार्ट थे,सब बेच डाला पाँच गुने के फेर में,अब खाली ।
जब घर की साखू की दहलीज बेचने चले,तब घर से एक कसमसाहट सी हुई ।।अंदर से आवाज़ आई, काश कामचोरी पहचान ली होती,तो यह दिन नही देखने पड़ते । एक बार जिसे पुरखों के सामान को बेचने की लत लग जाए,तो घर की ईंट ईंट बेचकर ही निकम्मे सुक़ून पाते हैं । घर में औरत चीख रही थी कि जब कुछ न बचे,तो मियाँ बाज़ार में हमे और बच्चों को भी बेच आना, यह सुनते ही लकदक कपड़े पहने ज़मींदार की आंखों में फिर चमक दौड़ गई कि अभी यह बाकी हैं बिकने को,इससे तो पक्का पाँच गुना खज़ाना भर जाएगा और वह उनको बेचने के ग्रहक तलाशने लगा ।
उसे बेचने के लिए ग्रहक मिल जाते थे,किसी को भी कुछ भी बेचना हो,उसके ग्रहक तो आसानी से मिल ही जाएँगे । बस जिसे एक ईंट भी बनानी पड़े,ऐसे हाथ मुश्किल से मिलते हैं । बेचने वाले को मेहनत करने वाले मूर्ख नज़र आते हैं । हमेशा से वह उन्हें मूर्ख ही समझता है, जो हज़ार हज़ार रुपये के लिए अथाह मेहनत करता है । संपत्ति बेचकर तरक़्क़ी नही होती है, सम्पत्ति जोड़कर तरक्की होती है, यह बात तब तक समझ नही आएगी,जब तक बिकने से मिले भोजन का स्वाद जीभ पर लगा रहे,जिस दिन दिमाग सोचेगा की एक नई ईंट कहीं सैकड़ो पुरानी ईंट बेचकर तो नही हासिल हुई है, जब यह समझ जाएँगे, उस ज़मींदार से किनारा कर लेंगे,जो सब बेचकर स्मार्ट बनते हैं । यह माना हुआ सच है, विरासत बेचने से कभी भी तबाही के सिवा कुछ भी हाथ नही आता...
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