ज़िन्दगी में दोबारा अब ऐसी ईद मत आए, बस,यही दुआ । हालांकि ईद ही क्या,ऐसे मनहूस दिन भी अब कभी लौटकर न आएँ ।
हम घूर कोरोना को रहे हैं कि चलो तुमको तो बर्दाश्त कर ही रहे हैं, अपनी बिरादरी से दूसरे भाइयों बहनों को हमारी ख़िदमत में अब मत भेजना,वरना,वरना क्या कर ही लेंगे,सिवाए खुद को तमाम तहों में छिपाने के सिवा...कोरोनाकाल में कोरोनासिवाई ही मिली बेचारे वह लोग भी नही मिले जिनके निकले हुए पेट से ही ईद मिल लिया करते थे । वह बिजली के तार से भी दुबली हड्डियों से भी ईद नही मिले,जिनसे मिलकर उनकी हड्डियाँ चुभ जाती थीं । उनसे भी ईद नही मिले जिनके पसीने से हमारे कपड़े पर धब्बे पड़ जाया करते थे,उनसे भी ईद नही मिल सके जिनके पास से जन्नत की हूरों को रिझाने के इत्र ऐसे लगे होते थे कि तीन धुलाई के बाद भी महक दम नही तोड़ती थी ।
उन कंजूसों से भी ईद नही मिले, जो चमगादड़ से भी बुरी शक्ल बनाकर ईदी ढकेल दिया करते थे,कोरोना इन पर ही गया है शक्ल ओ सूरत में । हम तो उनसे भी इस बार ईद नही मिल पाए जिनकी दी हुई ईदी से पूरे महीने की चाय के खर्चे निकल जाया करते थे । मनहूस कोरोना ने पूरी ज़िंदगी के मज़े किरकिरे कर दिए ।
वह सिवाईंयां और मटर भी बड़ी मिस कर रहे हैं, जो मुँह में जाते ही गड़ जाया करती थी,उनकी बेचारी सिवइयों ने दूध घी की शक्ल देखे बिना शक्कर में रगड़ रगड़ कर आत्महत्या की हुई होती थी और उनकी मटर तो पानी मे कंकर की तरह तैरा करती,बताओ यह ज़ायका भी छीन लिया मनहूस कोरोना ने । वह सिवाईंयां भी याद आ रहीं जिन्हें खाने को मुर्दे ज़िन्दा होने की दुआ करते कि काश एक रेशे का ही ज़ायका मिल जाता ।
ज़िन्दगी की सारी खटास मिठास को खत्म करके बदबख़्त कोरोना ने बकठा कर दिया है । अच्छे बुरे सब दिन मिटाकर खाली खाली दिन पकड़ा दिए हैं । फिर भी मायूस क्या होना,यह कोरोना न होता,तो कौन बड़े अच्छे दिन आने वाले थे,चीख चीख सबके कागज़ ही बनवा रहे होते,खुद को मिट्टी का लाल साबित करने में लाल पीले हो रहे होते,आखिर कोई हम सब इंसानों को सुक़ून से तो देखना नही चाहता था ।
जैसी भी है, जिसकी भी है, यही ईद है और यही सच्चाई है, सच्चाई से क्या मुँह मोड़ना । मीठी सिवइयों के साथ बेहद फीकी ईद मुबारक ।
आप सभी को और आपके सभी लोगों को तहेदिल से ईद मुबारक💐💐💐
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