मंटो तुम किस कदर बदतमीज़ हो। कैसी कैसी कहानिया लिखते हो। लोग चादरों में राल टपकाते हुए आँख सेंकते हैं और चादर से बाहर निकलकर तुमपर आँख लाल करते हैं । छोड़ो भी अब यह बातें,फिर भी चलो तुम लिखा करो। पढ़कर मज़ा आता है। कितना मज़ा आता है जब दिल में सैकड़ो तीर एक साथ चुभते हैं।बड़ा अच्छा लगता है जब ज़मीर पैरों से कुचला जाता है।कितना अच्छा लगता है जब नाली की खुशबु दिमाग को सड़ा देती है।अच्छा मंटो तुम्हे ठंडा गोश्त याद है, अर्रे वही जो तुमने आवारगी में लिखी थी।दोस्त सैकड़ों जाँघो पर पैर रख चुका हूँ मगर वह ज़ायका नही आया।
अब तुम हमेशा की तरह काली शलवार न लेकर बैठ जाना।तुमने तो लिखा है, हमने तो दंगों में काली,पीली,नीली,हरी सब शलवारें देखी हैं।इतनी शलवारो पर तो मंटो भी नही लिख सकता और मैं कोई मंटो तो हूँ नही।अच्छा एक बात बताओ मंटो तुमने सबपर लिखा है मगर बच्चों को क्यों छोड़ दिया।बच्चों की उतरती नेकर और हवस से मसलते बचपन को क्यों नही लिखा। क्यों नही उस बुड्ढे,एक बच्चे के गाल से जांघ तक उँगली फेरने की कहानी लिखी,राल टपकाते हुए अधेड़ की बच्चे के माथे चूम लेने भर से संतुष्ट होने के किस्से क्यों नही लिखे तुमने । बाज़ार में बिकता बचपन क्यों नही लिखा। घर घर मे नालियाँ थीं, तो घर घर मे सिसकता बचपन भी तो था मंटो,तुमने वह क्यों नही लिखा । अच्छा,तो तुम बड़े लेखक थे,तुम झुक कर बच्चों के लिए कहाँ लिख सकते थे। और नही तो क्या,आखिर मंटो ने क्या ठेका ले रखा है सब पर लिखने का।
ओए मंटो यह बताओ अगर तुम "उमराव जान अदा" लिखते तो क्या तुम्हारी उमराव वैसी ही होती जैसी हादी रुस्वा की थी।मैं सोचता रहता हूँ हादी ने उमराव को तबर्रुक़ बना दिया अगर तुम होते तो उमराव के जिस्म में सड़ रहे गोश्त को उधेड़ते।तुम बड़े चालबाज़ हो,एक जगह लिखे हो की वोह बगल में पता नही कौन सा बदबूदार पाउडर डालती थी की सारे बाल जल जाते थे,जिसकी कालिख़ उसकी बग़ल से हाथों तक उतर आई, जो ज़िन्दगी भर रही।तुमने कोठे पर बैठकर बग़ल की बदबू को महसूस किया तो हादी रुस्वा ने उमराव के बालों से उठती खसखस की खुशबू को पकड़ा।तुम लेखक लोग वाक़ई हद दर्जे चालाक होते हो।तुम्हे पता था की तुम्हारा लिखा नौजवान दिलों में पहली बार हलचल पैदा करेगा इसलिए आखरी में खींचकर झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ते हो।वैसे मंटो अगर आज तुम होते और लिख रहे होते यक़ीन जानो तुम्हारी खाल की ढपली बनाकर यह ज़माना बजा रहा होता।
खैर छोड़ो,वैसे भी तुम अब कहाँ लिख सकते हो।तुम तो कबके मर चुके हो,मंटो मर चुका है।हाँ एक शराबी मर चुका है।वह ऐसा शराबी था जिसके मरते ही शराब ने अपना अदबी मज़ा छोड़ दिया।आज तुम्हारी सालगिरह है मंटो,तुम बेहद याद आ रहे हो।आज तुम मेरी चाय में उतर आओ मेरे दोस्त।अच्छा ठीक है आज हम और तुम एक साथ चाय पीते हैं।वाह क्या इत्तेफ़ाक़ है तुम्हारे पास शराब के पैसे नही होते और मेरे पास चाय के रूपये नही होते।चलो कोई तो दो आवारो को चाय पिला ही देगा,वैसे भी मिसकीन से हमारे चेहरे बड़े काम आते हैं।कोई न कोई तरस खा ही जाता है।लो पियो चाय,मंटो।
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