Sunday, May 31, 2020

गंगा दशहरा

भगीरथ ने मां गंगा के पाँव पकड़े और पहाड़ से मैदान तक उन्हें लेकर आए । मां गंगा ने प्यास और भूख से तड़पते लोगों को अपने आँचल में ले लिया और अपने बच्चों में बिना फर्क के हर एक कि ख्वाहिशें पूरी की । जिसे अनाज चाहिए था,उसे अपने हुनर से अनाज सौंपा, जिसे प्यास थी,उसके गले तो ताज़गी बख्शी । पेड़ पौधे,चिड़िया,जानवर,कीड़े मकोड़े और इन सबके सामने खड़े इंसान को मां गंगा ने ज़िन्दगी दी,सब जी उठे,सब बढ़ चले ।

आज गंगा जी कैसी हैं, यह किसी से छिपा नही है । आज गंगा दशहरा है, यानि गंगा जी के समतल भूमि  पर आने का शुभ दिवस । राजा भगीरथ जब उन्हें लेकर आए थे,तभी से आजतक यह बात तो तय थी कि गंगा जी की ज़िम्मेदारी शासक की थी और जिसकी ज़िम्मेदारी शासक ले,उसकी सेवा करने का कर्तव्य जनता का था मगर अफसोस शासक और जनता दोनों ने अपनी ज़िम्मेदारी ऐसे नही निभाई की गंगा जी मुस्कुराती हुई बह सकें । गंगा जी ने अपनी ज़िम्मेदारी से मुँह नही मोड़ा,राजा भगीरथ से जो वादा किया,आजतक निभा रही ।

गंगा जी को नज़रंदाज़ करके आप अपनी मिट्टी से जुड़ाव को कमज़ोर करेंगे । राही मासूम रज़ा अपनी तीन माँ होने का ज़िक्र करते हैं, उनमें से पहली मां गंगा जी हैं । शिव हों या राम,बुद्ध हों या महावीर,तुलसी हों या कबीर, अकबर हों या अशोक, खुसरू हों या जायसी,शेरशाह हों या हुमायूँ,गाँधी हों या नेहरू सबको जिस एक आँचल ने समेटा है, वह हैं गंगा जी । शिव जी की जटा से धरती के सबसे कमज़ोर व्यक्ति तक जिसने अपनी पहुँच बनाई,वह हैं गंगा जी ।

आज गंगा दशहरा की बधाई और साथ मे यह कि गंगा जी से सीख सको तो सीखो,गंगा जी ने अपने खूबियों को किसी एक धर्म,किसी एक जाति,किसी एक लिंग,किसी एक जीव तक ही बांधे नही रखा,बल्कि हर एक के लिए बाहें खोल दीं इसीलिए तो वह मां गंगा हो गईं ।

किसी ने सूरज को गंगा जी का जल चढ़ाया तो किसी ने उसी जल में वज़ू करके नमाज़ पढ़ी,बताइए इससे पवित्र जल और क्या हो सकता है । गंगा जी किसी एक कि नही हैं, सबकी हैं,सबकी ज़िम्मेदारी भी है कि उनके आँचल में हमारी कमियों की छींटे ऐसे न लग जाएं कि उनको बहने में तक़लीफ़ हो । वह बच्चे सबसे बुरे होते हैं, जिनसे उनकी माँ तक़लीफ़ पाए और वह बच्चे बुरे बच्चों से भी बुरे बच्चे होते हैं, जो अपनी माँ के दुःख दूर करने की जगह आपस मे लड़ें ।

गंगा जी हमे मिलकर रहने का आशीर्वाद दें । गंगा जी धरती की तमाम गन्दगी बहा ले जा रहीं ऐसे ही हमारे मन की गंदगी को भी बहा ले जाएं । गंगा जी हमारे मन और आत्मा को इतना निर्मल कर दें कि उसमे नफ़रत,सम्प्रदायिकता,अलगाव,हिंसा जैसे कीटाणु पैदा ही न हो सकें ।

वह व्यक्ति गंगा जी को मां कैसे कहेगा,जिसका दिल क्षेत्र,लिंग और धर्म मे बंटा हुआ है, गंगा जी का असली पुत्र तो वही होगा जो गंगा जी की तरह बिना फर्क सबके लिए प्रेम रखे,सबकी सेवा करे और सबके काम आए । मां गंगा ने कभी अपने आशीर्वाद से मुँह नही मोड़ा,हमें भी अपने कर्तव्यों से मुँह नही मोड़ना चाहिए,चाहे मिट जाएँ । बिना कोई अन्तर किये हर धर्म,जाति, वर्ग,क्षेत्र की सेवा करते हुए मिट भी जाएँ,तो क्या है, मां गंगा के सच्चे पुत्र तो बने जाएँगे । गंगा दशहरा हमे याद दिलाने का दिन है कि अपने हृदय को गंगा जी जैसा विशाल और निर्मल कर लो ताकि उसमे हर बुराई बह जाए और अच्छाइयाँ पनप उठें,जैसे भगीरथ प्रयास के बाद फसल और इंसान मुस्कुराए थे...
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