मैंने देखा है की जब कोई अपने बच्चे का गू धोता या उठाता है तब वह अछूत नही होता है।उसी जगह जब कोई सब घरों का गू उठाता है तो अछूत हो जाता है।कोई अपना टॉयलेट धोकर घर में अछूत नही होता तो कोई सबके घरों का टॉयलेट धोकर अछूत हो जाता है।यही नही जो औरत अपने किसी एक से सेक्स करती है तो वोह चरित्रवान होती है जबकि जो सबसे वही काम करती है तो चरित्रहीन कहलाती है।यहाँ तक अपने घर से पैसे चुराने वाला चोर नही कहलाता बल्कि हर घर से चुराने वाला चोर कहलाता है।घर में माँ को पीटने वाला गुंडा नही कहलाता बल्कि हर एक को पीटने वाला गुंडा कहलाता है।यहाँ तक हमे वोह नौकर,वोह व्यक्ति पसन्द आते हैं जो सिर्फ हमारे काम आए, जो सबकी मदद करते हैं वोह हमारे दिलों से दूर रहते हैं।यह तो रही एक बात।
जब मैं यह सोच रहा था तो मैं समाज की सोच को महसूस कर रहा था।यह समाज अपने,व्यक्तिगत अपने लिए,हर चीज़ को अपनाता चाहता है।जैसे ही वोह चीज़ सबकी होती है,वैसे ही वोह समाज के लिए अछूत हो जाती है।यह बात बिल्कुल भी गहरी नही है।अपने इर्द गिर्द झाँक कर देखिये समाज की चाल खुद बखुद आपके हाथ आ जाएँगी।
अब ज़रा इन सब उदाहरणों से उस चीज़ को पकड़ने की कोशिश करें जो मैं कहना चाह रहा हूँ।वोह यह है की समाज हर उस व्यक्ति को नकार देगा जो सबका होगा।हर उसके पीछे से हट जाएगा जो सबके दिलों की बैसाखी है।यह समाज हर उसके पीछे खड़ा मिलेगा जिससे उसे व्यक्तिगत फायदा है क्योंकि सबका फायदा उससे देखा नही जा सकता।इसीलिए देखिये हर आने वाले कल मे वोह ही मज़बूत हो रहा है जो सिर्फ एक के काम आ रहा हो।जो सबकी बात करेगा वोह अकेला ही रह जाएगा।
हो सकता है हम गलत हों मगर अपने समाज की नब्ज़ पर हाथ रखकर कुछ ऐसे ही महसूस किया।मैं यह कभी नही कहता की मेरा लिखा ही अंतिम सच है।हो सकता है यह पूरा गलत हो मगर हम अपने समाज पर नज़र तो रख ही सकते हैं।उसके मनोविज्ञान को समझ सकते हैं।इतना समझ लें समाज में आई एक एक ऐंठन की भी ढेरो वजहें होती है।समाज का आजका रूप कल के चले फावड़ों और कुदालों और तमाम बातों से ही निकल कर आता है।वैसे समाज का हर बदलता रूप हमारे चरित्र में कहीं न कहीं नज़र आने ही लगता है।
गाँधी जब तक हमारी अपनी आज़ादी के लिए थे तब तक वोह हमारे हीरो थे।जैसे ही वोह सबके हुए,हमारे किसी काम के नही रहे।यह जो सबके होना है न बड़े जिगरे का काम है।यह सब जानते हुए की हम अछूत हैं, हम नकार दिए जाएँगे,तब भी समाज की फ़िक्र करना ,समाज के लिए खड़े रहना वाक़ई ऐतिहासिक और हिम्मत वाला काम है।अब जिन्हें आसान रास्ता चुनना है और अपने को हमेशा स्वीकार्य ही बनाए रखना है वोह सिर्फ अपनी थालियों की फ़िक्र करें और खुश रहें।जिन्हें हर तरह की आलोचना,तिरस्कार,अस्वीकार्यता के बावजूद ज़िंदा रहना है वोह सबकी थालियों की फ़िक्र करें।यह समाज उन्हें अपनाए या न अपनाए मगर उन्हें खड़े होकर हर एक को अपनाना होगा।उन्हें गले लगाना होगा।अपनी कूव्वत के हिसाब से अपना किरदार तय करिये और निकल जाइये।
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