"मैं भागता चला जा रहा था की ओबामा टकरा गए।ओबामा की मुझसे लड़ते ही सीने की हड्डी टूट गई।टूटने की आवाज़ से आसमान चटख गया।इतने में नीचे बैठी मनिहार ने आवाज़ दी मुझे।मैं दो क़दम में ज़मीन नाप कर उस तक पहुँचा।उसकी आँखों में आँखे डालकर मैंने ट्रम्प को शक्ति दी।ट्रम्प वोह शक्ति पाकर झेलम में जैकेट पहने लेटे मगरमच्छ के मुँह को अपने हाथों से फाड़ने लगा।मगरमच्छ की यह हालत देख कोरिया को मोटू लड़का डर गया।उसके डरने से जो।पसीना निकला वोह अरब में बारिश बनकर निकला।बारिश का पानी बहते हुए कब ज़िल्ले इलाही की नाक में समा गया ईश्वर ही जाने।"
यह जो आज लिखा है इसको बिलकुल उल्टा सीधा मत समझयेगा की क्या लिख दिया है।यह ही लनतरानी है।कल इस शब्द को इस्तेमाल किया था।यह अवध की वोह खूबसूरत कला थी जो ताँगेवाले से लेकर ज़मींदार तक सबको आती थी।यह इतनी आम थी की घरों में जब कोई ज़्यादा झूठ बोलता या बढ़ा चढ़ा कर कुछ कहता तो उससे कह दिया जाता था की ज़्यादा लंतरानी न सुनाओ।अब तो अवध की चौखट पार करके यह अमरीका तक चली गई है।
खैर लंतरानी के मज़े लें।हम तो दिनभर लंतरानी कहने की कूव्वत रखते हैं।क्योंकि इस आर्ट को ज़िंदा रखना है।इसकी महफ़िलों को ज़िंदा रखना है।अवध के आखरी चराग़ की राख अभी हमारे माथो पर लगी हुई है।लंतरानी ज़िंदाबाद।इसके ने उस्ताद ढोकला साहब ज़िंदाबाद।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Wednesday, March 1, 2017
लंतरानी
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hafeezkidwai
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