मन तड़पत हरि दर्शन को...सुबह सुबह यह गुनगुनाना मुझे पसन्द है।ताज्जुब है कभी किसी ने नही टोका न रोका।पता नही मेरी चौखट पर खड़ा मज़हब इतना मज़बूत है की भजन से दरकता नही या कहें हद दर्जे लापरवाह है की उसपर भजनों से फ़र्क नही पड़ता।मज़हब इन सबसे परे कहीं दिल में रहा।
कल जब एक लड़की को भजन गाने के लिए ट्रोल किया गया,गालियाँ, धमकियाँ दी गई तब एक साथ सब तरफ नज़र दौड़ गई।जी चाहा रहीम को कब्र से उठा लाए।जायसी से कहे की उठो अब कब तक सोगे।देखो तुम्हारे आँगन में ही लोग दो मीठे बोल नही बर्दाश्त कर पा रहें हैं।मैं इतिहास में गए भजनों से आज को नही बचाऊँगा।जिनको कल गाना था वोह तो गा गए।जिनको आज गाना है उनका क्या।
यह वोह लोग हैं जो प्रेम पूजा में फ़र्क नही कर पाते।इन्हें नही पता की प्रेम से फूटे लफ़्ज़ पूजा के दायरे से बाहर हैं।पूजा से निकली श्रद्धा प्रेम के इर्द गिर्द नही है।यह सब सीधा सा देखते हैं।किसी को रँगो से दिक्कत है तो कोई गाने से उलझा है तो कोई बोलने के ही खिलाफ है।यह तुम्हारा मज़हब है या छुई मुई का पौधा।
यहाँ एक मसला नही है की लड़की के भजन गाने पर कुछ सिरफिरे अपनी परवरिश को गालियों की शक्ल में दिखाते हैं बल्कि हर मज़हब इतना सिकुड़ चुका है की उसमे उनके खुद की ही गुंजाईश नही बची है दूसरे को तो छोड़िये।इतने बड़े बड़े जिस्म में चुटकी भर दिल रख यह और कर भी क्या सकते हैं।
एक बात और जान लीजिये,हमारे बड़े हमसे बहुत बेहतर और समझदार थे।उनके दिल और दिमाग खुले थे।यह जो आजके नौजवान हैं यह ज़्यादा संकुचित,जकड़े हुए हैं।मैं हनी सिंह टाइप लड़को को अंदर से इसकदर परम्पराओ में जकड़ा देख चुका हूँ की डर लगता है।यह गाली बकने वाले पुराने लोग नही हैं, यह बिलकुल नया तबका है।यह इस क़दर दिमाग से ख़ाली है की पुराने वायरस को आराम से पाल रहा है।
एक बार सोचिये तो की वोह तो भजन गा रही थी और यह गाली बक रहे हैं।अब भजन ज़्यादा गुनाह है या गाली।यह तो बड़ा सीधा सा पैमाना है इन्हें ख़ारिज करने का।हमारी नज़र में तो प्रेम में आप भजन गाइये,ईश्वर खुद आपके गले में उतर आएगा।यह हर चीज़ पर एतराज़ करने की आदत ने इनको दिमागी दीवालिया कर रखा है।एक बार अपने छोटे भाई,लड़के या दोस्त को देखिये अगर उनमे धर्म अतिक्रमण कर रहा है तो यह खतरनाक है।इससे वोह धर्म के मूल से हटकर अधर्म के दायरे में खड़े मिलेंगे।बड़ा आसान है यह जाँचना।नफ़रत को कौन महसूस नही कर सकता।जहाँ नफ़रत है वहाँ मज़हब कहाँ।यह हर एक के लिए है।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Thursday, March 9, 2017
भजन दिल से हैं
Labels:
hafeezkidwai
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment