Sunday, March 5, 2017

स्कूल बैग

यह सुबह सुबह ढेर सारे बच्चों को स्कूल जाते देख अजब ख़ुशी होती है।जी चाहता है दिनभर इन्हें देखता रहूँ और यह ऐसे ही उछलते कूदते जाते रहें।जब यह शरारत करते हैं तब दिल कहता है की आज इन्हें कर लेने दो,पता नही कल इनके हर क़दम पर लोग कैसी प्रतिक्रियां दे।

मैं जब बड़े से बैग से इनके झुके हुए कँधे देखता हूँ तो अफसोस भी होता है।क्या इतना कुछ पढ़ना ज़रूरी है।उन लेखकों पर भी तरस आता है जो छोटे क्लास के बच्चों की किताबे भी इतनी मोटी लिख डालते हैं की बच्चों की रीढ़ टूट जाए।

यह भारी भारी बैग उनकी शरारत में बाधा हैं।चाह करके भी हम अपने बच्चों के कन्धों के वज़न कम नही कर सकते।सोचिये उस माँ पर क्या गुज़रती होगी जो एक पॉलीथिन भी बच्चे को न उठाने दे,उसके सामने उसका बच्चा कई किलो वज़न लाद भी मुस्कुरा रहा हो।

बस सुबह सुबह यूँ खेलते हुए जाते बच्चों के बैग थोड़ा मायूस तो करते हैं मगर उनकी चमकदार आँखे रौशनी भरती रहती हैं।यह कमबख्त प्राइवेट स्कूल और पब्लिशर को तो गुलाबी नोट चाहिए,इन्हें क्या इनकी मिली भगत से भुगत कौन रहा है।

हाँ थोड़ा सा यह है की जब बच्चों को यों जाते देखिये तो एक बार उनके कल को उनकी आँखों में झाँक कर देखिये।उनका कल,आज हमारे हाथों में हैं।यह बेलौस मोहब्बत में लड़ते झगड़ते,हँसते खेलते बच्चों को कल कैसा मुल्क़ देंगे हम।कल उनकी पसन्द पर पहरा होगा।उनकी नापसन्द पर इलज़ाम होंगे।आज हम अपनी मर्ज़ी का वज़नी स्कूल बैग लदवाकर आदत डाले दें रहें हैं की ऐ बच्चों कल इससे ज़्यादा वजन तुम्हारे दिमाग पर लादा जाएगा।

खैर जो भी हो अगर हो सके तो इन बच्चों के लिए ऐसा माहौल छोड़ना की इनकी मुस्कान बनी रहे।इनके दिल की धड़कन बिना डर के धड़के।इनके कन्धों पर लदा वज़न ज़िन्दगी को रोक न दे।हाँ कोशिश कीजिये की यह बैग हल्के हों जाएँ।ताकि बच्चे बेधड़क उछल कूद तो सकें।वैसे भी कल उनकी हर चीज़ पर पहरा होगा ही।आज तो कम से कम एक खुला आसमान दे दिया जाए।

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