जब अख़बार अपना रस खो दें।टीवी आपके अन्दर कोई शोर न पैदा करें।रेडियों की आवाज़ सिर्फ कान तक जाए।तब ठहर जाइयेगा।सोचिये की आखिर क्या था जो बासी हो गया।वोह कौन चीज़ थी जो सड़ गई।मुझे नही लगता की हमे इनकी ज़रूरत है।यह अख़बार मेनहॉल का ढक्कन खुला और स्तुतिगान ही लिखें तो बेहतर।यह टीवी स्वर्ग की सीढ़ी और शबरी के बेर ढूंढे यही सही है।मुझे इनसे ज़रा भी उम्मीद नही।
मुझे तो अब यह अख़बार कॉपी पर कवर चढ़ाने लायक भी नही लगते।मैं तो इतना मानता हूँ की सूचना की ज़बरदस्ती पैदा की गई भूख ने हमे खूँखार बना दिया है।मुझे हैरत है जब डॉक्टर भ्रष्ट होता है तब तो वोह किसी एक समय किसी एक की मौत का कारण बनता है।जब इंजीनियर भ्रष्ट होता है तो वोह एक समय में सैकड़ों की मौत का कारण बनता है मगर जब पत्रकार भ्रष्ट होता है तब वह एक पूरी सभ्यता की मौत का कारण बनता है।
अब तो यह वक़्त आ गया है की हमारी ज़िन्दगी में इनकी ज़रूरत ही खत्म हो गई है।यह सिर्फ चटखारे के लायक बचे हैं।इन्होंने अपने किरदारों को भरे बाजार बोलियाँ लगाकर बेच दिया है अब इनसे वापसी की उम्मीद बेईमानी नज़र आती है।
मैं तो कहता हूँ देश के लिए हर उस चीज़,हर उस व्यक्ति हर उस विचार पर हाथ रखा जाए,जो हमे गर्त में ले जा रहा है।मैं भी नही चाहता अब यह मिशन की तरह काम करें,अब यह खुला मण्डियों वाला व्यापार ही करें तो बेहतर है।अब इतना साफ़ है मेरी नज़र में की देश को अगर हमे आगे बढ़ाना है।उसे खूबसूरत बनाना है।उसे चमकते आसमान तक ऊँचा ले जाना है।उसके बच्चों की मुस्कान की खिलखिलाहट को बनाए रखना है तो वोह रास्ता हमारे दिल से आपके दिल का होगा।यह सब करने में अब हमे किसी मीडिया की ज़रूरत नही।देश के निर्माण के योगदान से मीडिया बहुत दूर जा चुकी है।अब वोह सिर्फ और सिर्फ अपनी क़ीमत की वजह से ज़िंदा है क्योंकि उसकी आत्मा खत्म हो चुकी है।
अब देश एक दिल से दूसरे दिल तक सफ़र करके धीरे धीरे आगे बढ़ेगा।उसे तेज़ी से आगे बढ़ाने के साधन में घुन लग चुका है।इसलिए मुल्क़ की मुस्कान बनाने वाले लोग ज़्यादा मेहनत और धैर्य से आगे बढ़ें।यह हमारा देश है जो मोहब्बत को खूब खाद पानी देता आया है,देता रहेगा।मज़बूत होकर खड़े हो,इस देश को रीढ़ वाले लोगों की बेहद ज़रूरत है।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Wednesday, March 29, 2017
उठो खुद जूझो
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hafeezkidwai
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