Monday, March 6, 2017

तोड़ दो इनको

यह जो आलीशान विधान भवन और संसद भवन हैं।जी चाहता है इन्हें तोड़ दें।इनको पत्थरों से आज़ाद करके छप्पर डलवा दें।इनके फर्श तोड़कर छूही मिटटी से पुताई करवा दें।तब शायद अंदर बैठने वालों को बाहर बैठने वाली की तड़प महसूस हो।
लालकिले से तो हमेशा देश खुशहाल दिखता रहा है।हमारी तकलीफे कभी इतनी हिम्मत कर ही नही पाई की लालकिले की ऊँची ऊँची दीवारों को पार कर पाती।पता नही वोह कौन से लोग हैं जो इतनी ऊँचे चढ़ कर ऊँची ऊँची बातें करते हैं की हम ज़मीन के लोग दो गज और ज़मीन में धँस जाते हैं।
मेरे लिए कल भी सल्तनत ही थी और आज भी है।कल भी बादशाह के लिए सवाल गुस्ताखी कहलाते थे,आज भी कहलाते हैं।कल भी बादशाह अपने गुंडों के सहारे ज़बान को हलक में कैद किये था,आज भी किये हुआ है।यह लाल किले का ख़मीर ही है, जो एक बार उसपर चढ़ गया,उसे नीचे धुन्धला दिखने लगेगा।
हमारे राज्यों के विधान भवन को भी देख लें।जिन्हें हमने लाइन में लग कर चुना है, वोह ही हमे उसके अंदर नही आने देते।हमारे सवाल किसी लकड़ी के घुनहे दानपत्र में जमा होकर दम तोड़ते रहते हैं।नाम रख दिया शिकायत पेटी मगर उसमे रखी शिकायत भला किसे बर्दाश्त।यहाँ तो हर दल एक जैसा है।
यहाँ दुकाने एक हैं बस दुकानदार बदलते हैं, उनके चट्ठे बट्ठे बदलते हैं।मुझे हर वोह भवन कोप भवन लगता है जिसमे हमारे बेधड़क जाने पर पाबन्दी है।जो हमारे ही चुने हुए लोगों ने,हमसे ही डर कर खुद को क़ैद कर रखा है।मन में सवाल उठते हैं मगर क्यों करें सवाल।
मैं सच में चाहता हूँ विधान सभाए,संसद की कारवाइयाँ बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे लगें,निबहरे में लगें यूँ ऐसी में बैठकर खुद को जनता का सेवक कहना बड़ा झूठा सा लगता है।
खैर यह ऐसी बातें हैं जो मुमकिन ही नही।यह जनता खुद नही चाहती की उसका नेता सादे मिजाज़ का हो।उसे भी तो भौकाली नेता चाहिए।जनता को हमेशा डराने वाले शासक पसन्द आते हैं, मोहब्बत करने वाले नही।इसलिए अब यह भवनों की दीवारें और ऊँची हो जानी चाहिए।प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री,मंत्री,चुने प्रतिनिधियों के लिए सड़क ऊँची कर देनी चाहिए।बल्कि जो आँख उठाकर इनके भवनों को देख ले तो उसकी आँख भी निकाल लेनी चाहिए।
आपको लगता है ऐसा नही हो सकता है।ऐसा ही हो सकता है।जब आप चुने हुए नेता को बादशाह बना देते हैं।बादशाह भले यह न करे मगर उसके लम्पट समर्थक ऐसा ही करते हैं।वोह बोलने पर ज़बान खींच लेंगे।देखने पर आँख निकाल लेंगे।नही माने तो ग़ायब कर देंगे की ईश्वर भी न ढूंढ पाए।
इतने के बावजूद कोई इक्का दुक्का बेहतर चुन कर आ ही जाता है।जो इंसान होता है।सिर्फ उसके लिए सब बर्दाश्त।यही तो मोहब्बत है।जाओ रहने दिया तुम्हारे विधान भवनों को वरना इन्हें छप्पर में बदल देते दोस्त

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