Monday, March 13, 2017

14 मार्च

एक तरफ मार्क्स खड़े हैं तो दूसरी तरफ आइंस्टीन।तीसरी और लांस नायक कर्मवीर सिंह है तो चौथी ओर जय नारायण व्यास।इनके साथ बीच में हैं आमिर खान।मार्क्स,कर्मवीर और नारायण व्यास आजके दिन यह ज़मीन छोड़ कर गए थे अनंत की ओर तो उसी अनंत से आइंस्टीन और आमिर इधर ज़मीन पर अपने हुनर के रँग बिखेरने आए थे।
मार्क्स को कौन नही जानता,हर देश में उनके आर्थिक,सामाजिक और दार्शनिक विचारों से प्रभावित इंसान मिल जाएगा।दूर भारत के गाँव में अकेले पलँग पर पड़ा कोई व्यक्ति जब उसे अंदर से खंगालो तो मार्क्स उसमे कहीं छुपे आराम कर रहें होंगे।यह हैं मार्क्स जो भूगोल को ध्वस्त करके मानव मात्र में घुल गए।

करमवीर सिंह को लोग कम जानते होंगे।कश्मीर पर चीखने वाले बहुत लोग मिल जाएँगे मगर वोह यह नही जानेंगे की इस रियासत को हाथों से खिसकते खिसकते रोकने में किन किन का हाथ था।पढ़ाई में बेहद कमज़ोर और शरारत में अव्वल करमवीर को जब घर वाले खेती में लगा देना चाहते थे तब ही उसने सब पाबन्दी छोड़ फ़ौज़ का रुख किया और कई युद्धों में माटी के लिए लड़े।कश्मीर उनमे से सबसे बड़ा मसला है जिसमे करमवीर ने कमान सम्भाली।
अब आजके ही दिन गुज़रे जयनारायण व्यास को देखिये पहला इंसान जिसने जागीरदारी प्रथा को खत्म करने की बात की।काँग्रेस के ऐसे नेता जिनके पीछे अथाह हुजूम।राजस्थान के मुख्यमंत्री बनते ही देश को बुनने का काम शुरू।मुझे अफ़सोस है की इन बनाने वाले लोगों को एक ही तराज़ू में तौलकर सब कुछ भुला दिया गया।

मैं आइंस्टीन के किस्से में हाथ नही डालूँगा क्योंकि उनपर खूब लिखा पढ़ा गया है।रबीन्द्रनाथ टैगोर का उनसे मिलना और वोह बातचीत किस हद तक लिखी जा चुकी है पढ़ी जा चुकी है।आइंस्टीन का संघर्ष और उनकी दुनिया की दें को कौन भुला पाएगा।गाँधी पर आइंस्टीन का जवाब ही तो मुझे गाँधी की तरफ और बढ़ जाने को कहता है।अब रही बात आमिर खान की तो वोह आपके सामने हैं।उनकी कला को चाहे नकारिये या तारीफ़ करिये यह आपके किरदार का मसला है।

मेरा इन सबको छूने भर का सिर्फ इतना मकसद है की तारीख़ के ही सहारे सही कम से कम उन लोगों को जान लीजिये जो मुल्की की नीव रख रहे थे तो कुछ दुनिया की ज़िन्दगी आसान कर रहे थे।इनके होने से दुनिया खूबसूरत बन रही थी।इनके जाने से दुनिया ने अपने प्रेमियों को खोया।ज़रूरी नही की आप हर एक को मानिये मगर हर एक की दुनिया को दी गई चीजों के लिए नज़रअंदाज़ नही कर सकते।इनमे से कोई तालाब है तो कोई नदी तो कोई समन्दर मगर हर एक की समाज को बराबर ज़रूरत है।
मुझे सीमा के लिए करमवीर चाहियें,ज़िन्दगी आसान करने के लिए आइंस्टीन तो ज़िन्दगी को दिशा देने के लिए मार्क्स,उस दिशा को ज़मीन पर उतारने के लिए जयनारायण व्यास और इस ज़िन्दगी में रस के लिए आमिर खान।तभी तो ज़िन्दगी खुशनुमा बनेगी जब सब तरह के रँग होंगे।जब सब तरह का मज़ा होगा।यही तो दुनिया है आज उन सबको याद करलें।यह हमारे अपने हैं।

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