आपने मेकअप बॉक्स देखा होगा।उसमे काजल होता है, पाउडर,क्रीम,लिपिस्टिक वगैरह।इसमें नासमझ से नासमझ इंसान भी बता सकता है यह इंसान को खूबसूरत बनाने का सामान है।अब ज़रा कोई काजल को मुँह भर में लगा दे और उसमे रखी कैंची से आँख फोड़ दे तब क्या होगा।यही चेहरे को खूबसूरत बनाने वाली चीज़ें उसे बदसूरत बना देंगे।ठीक ऐसे ही,बिलकुल ऐसे धर्म है।धर्म का काम इंसानियत को खूबसूरत बनाना है।अब अगर कोई इसका गलत इस्तेमाल करे तो ज़ाहिर है खूबसूरती फौरन ही बदसूरती में बदल जाएगी।
अब ज़रा अपने इर्द गिर्द देखिये।धर्म के नाम पर क्या क्या हो रहा है।अभी कुछ वक़्त पहले पाकिस्तान में शाह कलन्दर की मज़ार पर कत्लेआम मचा दिया गया।सैकड़ो लोग इस सनक की भेंट चढ़ गए की वोह अधर्म कर रहे थे।नाचना और कव्वाली को अधर्म ठहराकर उन्होंने मासूम इंसानों का ख़ून बहाकर धर्म की अच्छी परिभाषा गढ़ी है।यही वोह लोग हैं जो मेकअप बॉक्स की कैंची से बाल सवारने की जगह आँखे फोड़ते हैं।ऐसे उदाहरण से हर देश भरा पड़ा है।कहीं कोई ज़मीन नही ख़ाली जहाँ धर्म की रक्षा किसी का ख़ून बहाकर नही की जा रही हो।
यह सोचने का विषय है की जो उत्थान के लिए आया था वोह पतन का कारक कैसे हो गया।जिसे इंसानों में खुशबू भरनी थी वोह सड़ाँध में कैसे बदल गया।जब यह सोचने लगेंगे तो सबसे पहले ही इसकी वजह पकड़ में आ जाएगी।एक बार इन सभी धर्मो के झंडाबरदार को देखिये।यह सब आपको बताएँगे धर्म सरलता को कहते हैं।जीवन सादा जीना चाहिए।संयम पर घण्टा भर बोलेंगे मगर जैसे ही आप इनपर ऊँगली उठाइये इनका खुद का संयम कितना क्षणभंगुर है, पता चल जाएगा।जिनके हाथ में धर्म की कमान है वोह इतने सरल हैं की आप उनसे मिल नही सकते।एक बार ईश्वर आपको आसानी से मिल जाएगा मगर यह नही।
पीछे मुड़कर देखिएगा की जिन सन्तों,सूफ़ियों ने धर्म का प्रचार किया,क्या वोह आलीशान महलों में रहते थे।या उनसे मिलने के लिए आपको जेब ढीली करनी पड़ती थी।या उनके दरबार में विशिष्ट,अतिविशिष्ट,
साधारण वर्ग निर्धारित थे।यही जड़ है, जब प्रचार ही गलत हाथों में हैं तो नुकसान तो उठाना ही होगा।इन सबके बीच भी कुछ मुट्ठीभर लोग बेहतर काम कर रहें हैं बस उन्हें सामने लाने की कोशिश करनी चाहिए।यह वोह लोग हैं जिनके मुँह से तोड़ने की बातें नही निकलती,यह तो जोड़ते हैं।
कुछ लोग खड़े होकर एक सिरे से धर्मो को ख़ारिज कर देते हैं, यह भी एक गलत पृवृत्ति है।वोह भूल जाते हैं की हमे इन्ही धर्मो ने किस क़दर संवारा है।अलग अलग बिखरे हुए लोगों को एक समूह में जोड़कर सभ्यता का निर्माण भी इन्ही धर्मो की देन है।बस गलती इतनी भर है की वक़्त के साथ जो बुराइयाँ आती जाती हैं उन्हें दूर करने की कोई व्यवस्था नही है।बस यही बुराई का लाभ उठाकर कोई कब सैकड़ों का ख़ून पी ले,कहना मुश्किल है।
पहले समाज सुधारक और धर्म सुधारक हर जगह होते थे।यह किसी के मोहताज नही थे,यह अकेले घूम घूम कर बुराइयों के विरुद्ध सचेत करते रहते थे।जिसका बड़ा असर पड़ता था समाज पर मगर अब क्या।अब तो इनकी जगह सामाजिक आलोचक और धर्म आलोचकों ने ले ली है।यह किसी भी हाल में सुधार नही चाहते,चाहें भी कैसे जब इनके विचार में धर्म टिकता ही नही है।यह आलोचना करेंगे मगर हल नही बताएँगे।यह धर्म में पड़ रहे कीड़े दिखाएंगे मगर उन्हें दूर करने नही उठेंगे।यह ऐसे लोग हैं जो धर्म की विकृतियों पर दस दस घण्टे बोल सकते हैं और इतना लिख सकते हैं की प्रगति मैदान भर जाए मगर निकल नही सकते।दो क़दम यह धार्मिक सुधार के लिए नही चलेंगे।
इसलिए कहते हैं की हर बुराई की जड़ सिर्फ एक में नही हैं।धार्मिक कट्टरता का पागलपन एक दम से बढ़ा भी नही है।यह भी तो देखिये इसे रोकने को क्या किया गया है।किसने एक अभियान के तहत धार्मिक विसंगति को दूर करने की चेष्ठा की है।दो चार जो अपने को सुधारक करकर टीवी पर दिखते हैं, वोह सिर्फ व्यंग्य और मज़ाक उड़ाने के माहिर हैं।यह लिख लीजिये किसी का भी मज़ाक उड़ाकर आप जीवन में कभी सुधार नही ला सकते ह।
धार्मिक कट्टरता लगातार बढ़ रही है इसमें कोई शक नही है।भारत समेत ज़्यादातर देश इसकी ज़द में हैं।पाकिस्तान और अरब देश अपने ही नागरिकों के ख़ून से सुर्ख़ हो चुके हैं।भारत में लगातार एक दूसरे धर्म को तिरछी निगाह से देखा जा रहा।कभी कभार तिरछी निगाह कटारी में बदल कर ख़ून भी बहा देती है।यह ख़ून खाने के पागलपन से भी शुरू हो सकता है।इन सबसे चिंता की बात तो यह है की आमजन को इनका सहयोग मिल रहा है।ख़ून बहाने वालों के माँ बाप भी उन्हें अपनाए हुए हैं, बल्कि बेहियायी से उनके साथ खड़े हुए हैं।उन्हें नही पता की उनके अपने घर में उनका बेटा कब खूंखार जानवर में बदल चुका है।
ताज्जुब तो यह है की अमरीका जैसे देश में भी यह पागलपन सर चढ़ कर बोल रहा है।देश,भाषा,खाने पीने, धर्म,रँग के आधार पर ख़ून बहाने को समाज ने मौन स्वीकृति दे रखी है।हर घटना को पिछली घटना से सही साबित किया जा रहा है।हर गुनाह को यह कहकर सही ठहराते हैं की कल भी तो यह गुनह हुआ था।अब कौन बताए जो कल गलत था वोह आज भी गलत है।जो कल अपने धर्म के लिए आपका ख़ून बहा रहे थे वोह कल गलत ही थे।उनके बदले जो आज आप ख़ून बहाएंगे वोह भी उतना ही गलत होगा।
मैं यह नही कहता की एक तरफ से सबको छाँटना शुरू कर दें मगर इतना तो हो सकता है की अपने अंदर मौजूद बुराई को धीरे धीरे तो खत्म कर सकते हैं।हमसे धर्म को अपनाते हुए इतनी गलती तो हो ही गई की यह मस्जिद मन्दिर गिरजे से निकलकर खेल के मैदान,
व्यापार,स्कूल, किचेन सब जगह पहुँच गया।सब जगह पहुँच उसने ऐसे ऐसे लोगों को बाँट दिया की हर चीज़ का मज़ा चला गया।
अभी बहुत वक़्त नही गुज़रा है अगर आप अपने बच्चों को खुशहाल ज़िन्दगी देना चाहते हैं तो ठहर जाइये।उसके मन में शुरआत में ही दूसरे धर्म के लोगों के प्रति विष न भरिये।अगर वोह ऐसा बाहर से सीख कर आए तो उसे समझाइये।यह इसलिए ज़रूरी है क्योंकि कल जब आप नही होंगे तब तक माहौल और बुरा हो चुकेगा,तब आपके बच्चों को आपके दिए माहौल में घुट घुट कर मरना होगा।इसलिए एक बार उन देशों की तरफ देख लीजिये जिनके सनकपन ने बच्चों को रेत पर उल्टा बहा दिया है।उन देशों की दीवारों से सीखिये जिनमे उनके बच्चों की ख़ाली चिपकी हुई हैं।कल अगर अपनी ही ज़मीन पर अपने बच्चों के भुनने की गंध नही सूँघनी हैं तो आज तैयारी कर लें।
हमारे नज़दीक़ भी कट्टरपन का भेड़िया आ चुका है।हमारे भी अपने लोग उस भेड़िये के दाँतो में लगे ख़ून को देख खुश होने लगे हैं।जिनको इन भेड़ियों के दाँतो में फंसे इंसानी गोश्त के रेशे विचलित करते हों,वोह उठ खड़े हों।अब वक़्त है की ज़मीन पर आइये और मुकाबला कीजिये।हमारी माटी की खूबसूरती बचाना हम सबका फ़र्ज़ है।शाह कलन्दर हो या हमारे यहाँ का कोई मन्दिर मस्जिद या हमारे अपने घर और बाजार।अगर हमे इन्हें ख़ून से रँगने से रोकना है तो इस कट्टरपन पागलपन के विरुद्ध बिना संकोच के खड़े हो जाइये।ख़ामोशी से बैठना भी तो इनको साथ देने जैसा ही अपराध है।हर उस चीज़ का विरोध कीजिये जो समाज को बाँटे।हर उसके साथ होईये जो समाज को जोड़े।यह जो धर्म है जोड़ने के ही लिए तो आए थे।इन धर्मो को तोड़ने का साधन बनने से बचाइये।यह सही है की धर्म को आपकी ज़रूरत है।धर्म को अधर्म से बचाने की ज़रूरत है।धर्म को उन हाथों से आज़ाद करवाइये जो छुपकर उसका गला घोंट रहें हैं।यह धर्म हमारी खूबसूरती बढ़ाने के लिए हैं।दिलों को मासूम करने के लिए हैं।हमारे जिस्म में खुशबू डालने के लिए हैं।इन्हें आज हमारी ज़रूरत है।यह धर्म ही समाज को फिर संवारेंगे क्योंकि और कोई रास्ता अभी तक तो नज़र नही आ रहा,हो सकता हो मगर जब वोह दिखेगा देखा जाएगा।अभी उठकर जोड़िये वरना तोड़ने वाले इतने ताक़तवर हो जाएँगे की हर तरफ सुर्ख़ रँग ही रह जाएगा।
हफ़ीज़ क़िदवई
No comments:
Post a Comment