जब हमारा अपने घर मे चाचा,फूफा,मामा,ताऊ जैसे रिश्तों से संवाद टूट रहा था,हमे ज़रा भी फिक्र नही थी कि इसका क्या असर होगा । हमारे पीछे के वक़्त में वह तमाम रिश्ते इतने दूर के हो गए,जो कभी दस्तरख्वान का ज़रूरी हिस्सा होते थे । हमारे घर मे बड़े बूढ़ों से बात तो छोड़िए,बच्चे तो उनकी शक्ल देखने को तरस गए । यह वही वक़्त था जब हमने अपनी आज़ादी के लिए घर के ज़रूरी रिश्तों को तोड़ दिया या दफ़न कर दिया ।
यह जो हम कर रहे थे,हमे लगा हमही सयाने हैं । हम अकेले ही अकेले मज़े करने वाले हैं । जबकि जो हमारे घर की हलचल होती है, वही लाखों घरों में भी होती है, यह सब मिलकर समाज को गढ़ते हैं, सभ्यता बुनते हैं । हर घर मे आज़ादी ने हुंकार भरी और घरों में रिश्तों की तमाम दीवारें चटख गई । बुड्ढे दरक कर ढेर हो गए और बच्चों ने खुली हवा में सांस लेकर सत्ता और अधिकार अपने हाथ मे लिया,जहाँ कर्तव्य जैसी पुरानी बातें धूल में मिल गईं ।
अब देखिए आपको हर तरफ लड़ता झगड़ता और बदले की हुंकार भरता नौजवान मिल जाएगा । ऐसा नौजवान जिसका एहसास मर चुका है, जिसमे विवेक जीवित नही है, जो आपसी प्रेम से पूरी तरह महरूम रहा है । जिसने घर मे बढ़े बूढ़ों को निपटते हुए देखा है । जिसके सामने चाचा और ताऊ रास्ता बदल लें,उसे हम और आप समझाने की कोशिश करते हैं । जिस बच्चे ने परिवार के संस्कार का केवल मज़ाक़ बनते हुए देखा हो,जिसने आलोकनाथ की इमेज पर चुटकुले बनाए हों, जिसने सच्ची बातें करने वालों को मूर्ख समझा हो,उस बच्चे से हम अब उम्मीद करते हैं कि वह समाज से सभ्य तरीके से पेश आए ।
कोई एक दिन में हत्यारा,दंगाई या बलात्कारी नही बनता है । बल्कि इसमें इन अपराधों के बीज होते हैं, जो मौका पाते ही विकराल रूप धरकर इंसान से शैतान बनाते हैं । यह जो "मौका" होता है ना,यही हमारे बड़े बूढ़े जल्दी देते नही थे । यही मौका ही तो हमारी आज़ादी थी । इस मौके का ही तो अच्छा बुरा नतीजा आता है ।
अब पलट कर पुरानी संस्कृति लाना तो मूर्खता की बातें हैं, इस पृथ्वी पर कोई भी संस्कृति कभी भी पलट कर वैसी ही नही लौटी है । इसलिए हम संयुक्त परिवार की बात नही करेंगे । यह भी नही कहेंगे कि चाचा ताऊ फूफा मामा जैसों को फिर से पलकों पर बैठाओ ।बस इतना कहेंगे ऐसे लोग अपने इर्द गिर्द बनाओ,जो बच्चों की बिगड़ती चाल की शिकायत बिना यह डरे बता सके कि कहीं आपतो बुरा नही मान जाएँगे । इन रिश्तों की जगह तमाम संगठन के वाहियात पदाधिकारियों ने ले ली है । जो हमारे बच्चों को ज़ोम्बी बनाने पर तुले हैं । उनके दिलों से मोहब्बत खत्म करके विवेक शून्य बनाकर अपना हथियार मात्र बना देना चाहते हैं ।
जब नज़र रखने वाले रिश्ते न रहें तो खुद नज़र रखें । अपने बच्चों को देखें कि वह क्रूर तो नही बन रहें, किसी दर्द पर मुस्कुरा तो नही रहे । समाज पर नज़र रखें,यह जानकर की जो आप कर रहें,वही लाखों करोणों लोग कर रहें हैं । इसलिए ऐसे कदम उठाएं,जिससे सभ्यता चमके ।
एक आखरी बात,जो समाज अन्यायी हो गया,उसका विनाश निश्चित है । समाज हमारे घर से शुरू होता है, हमारा घर अन्यायी के साथ खड़ा होगया,तो हमारे घर का विनाश निश्चित है । हमारा घर हमसे ही तो है, अगर हम अन्यायी हो गए,तो हमारा विनाशकाल बिल्कुल सामने ही खड़ा है ।
सम्भल जाओ,प्रेम को पालना सीख लो,उससे पहले की नफ़रत गिद्धों की तरह तुम्हारी खुशियां नोच डालें..
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