Thursday, June 27, 2019

कब्र का बीज

मुझे कब्र में दफ़नाना, दफ़नाना नही है, बल्कि रोपना है । मैं मिट्टी में दबे बीज की तरह किसी दिन कब्र से फूट पडूंगा । मेरी कब्र से निकला अंकुर,एक बड़ा वृक्ष बन जाएगा । उस वृक्ष मे मेरे जैसे और बीज बन जाएँगे जो पूरी धरती पर बिखर जाएँगे ।
तुम्हे पता है कि एक लेखक मरता नही बल्कि बिखर जाता है । उसके शब्द तमाम बीज बालियाँ होती हैं । जो अगले लेखक के आने तक मुस्तैदी से ज़माने के साथ खड़ी रहती हैं ।

मैं कब्र में दफ़न नही बल्कि रोपा जाऊँगा । मैं बीज हूँ, प्रेम का बीज,जिसपर मिट्टी,पर्यावरण,जलवायु और तुम्हारे रोज़ बदलते आचरण का प्रभाव नही पड़ता । मैं प्रेम बीज हूँ, जिसमें अंकुर फूटना ही एकमात्र सत्य है । ऐसा बीज हूँ, जिसे यह ज़माना नफ़रत की उमस से फूटने की हद तक ले जाने को बेक़रार है ...अब बीज को रोप दो उससे पहले की और देर हो जाए...

No comments:

Post a Comment