Thursday, June 20, 2019

जेल रास्ता है

"हम कहते थे उनसे की यह फटे कम्बल की सिलाई से अच्छा हमे सड़क की कंक्रीट तोड़ने में लगा दें । उन्हें लगता था बंद कोठरी में कम्बल ठीक करना ज़्यादा आसान काम है और कड़ी धूप में बिना किसी साय में,कंक्रीट बनाना मुश्किल काम है । मैं कहता कि मेरे लिए दोनो काम एक जैसे हैं, बस बाहर खुली हवा है और उस हवा में हमारे जैसे और लोग हैं । लोगों को देख भर लेना मेरे लिए सुक़ून है ।"

यह थे मोहन दास गाँधी, अफ्रीका में पहली जेल यात्रा का ज़िक्र था । पत्थर तोड़ते तोड़ते उनकी दोनो हाथों में छाले पर जाते,पैर सूज कर फूल जाते मगर फिर भी एक ही बात की अपने हर साथी के साथ मुस्कुराते हुए कहते,यह वक़्त एक खूबसूरत सुबह के लिए है । ऐसी सुबह जिसको सत्य,अहिंसा और धर्म मार्ग से हम प्राप्त करेंगे ।
गाँधी कहते,अन्याय से उपजे संघर्ष के दिनों में सबसे खूबसूरत जगह जेल है । जेल के सख्तियाँ तुम्हे मज़बूत करेंगी । कंकर मिला खाना तुम्हे तुम्हारे लक्ष्य पर टिकाएगा । तुमपर होने वाला अत्याचार,तुम्हे तुम्हारे मकसद के और नज़दीक़ ले जाएगा । जेल जाओ,वह सब बर्दाश्त करो,जो दूसरे कैदी करते हैं....

जेल की कालकोठरी में ही उस सुबह का सूरज छिपा है, जिसे तुम देखना चाहते हो । मोहब्बत करों सलाखों से,यह जेल की सलाखें नही तुम्हारे विश्वास की निशानी हैं । मत लो ज़मानत,मत भरो जुर्माने,कहो कि हमे जेल भेजो,यह जेल ही तुम्हे गाँधी के शुरुआती रास्ते पर ले जाएगी....लम्बा,थकाऊ,कठिन सफर भले हो मगर रास्ता यही है, चाहे आज चलो चाहे कल,चलना यहीं हैं....जेल से मत डरो,डरो उस दिन से की कहीं जेल में हम कमज़ोर पड़कर टूट न जाएं ।

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